सुर-गंगा का रहस्य: संगीत, साधना और आत्म-जागरण की आध्यात्मिक यात्रा

 

जब हृदय में बहे सुर-गंगा: संगीत, साधना और आत्म-जागरण का अद्भुत रहस्य 

ध्यानस्थ साधक, वीणा बजाते हुए, दिव्य सुर-गंगा और आध्यात्मिक प्रकाश से घिरा शांत हिमालयी दृश्य।
हृदय में बहती सुर-गंगा: जहाँ संगीत साधना बन जाता है और आत्मा जागृत होती है।


भूमिका

आज का मनुष्य बाहरी शोर से घिरा हुआ है। जीवन में भागदौड़, तनाव, असफलता और मानसिक अशांति इतनी बढ़ गई है कि मन की मधुरता कहीं खोती जा रही है। हम संगीत सुनते तो हैं, परंतु क्या वास्तव में उसे अनुभव कर पाते हैं?

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा कहती है कि सच्चा संगीत केवल कानों से नहीं, बल्कि जागृत हृदय से सुना जाता है। जब भीतर की चेतना जागती है, तब जीवन स्वयं एक मधुर राग बन जाता है। संगीत केवल कला नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच संवाद का सेतु है।

आइए समझते हैं कि संगीत, साधना और गुरु का संबंध हमारे आध्यात्मिक जीवन से कैसे जुड़ा हुआ है।


शास्त्रीय आधार: संगीत केवल स्वर नहीं, साधना है

भारतीय संस्कृति में संगीत को "नाद ब्रह्म" कहा गया है।

प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है—

"नादः ब्रह्म स्वरूपोऽस्ति"

अर्थात् नाद या ध्वनि स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है।

सामवेद को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। ऋषियों ने अनुभव किया कि जब मन शांत होता है, तब भीतर से एक दिव्य ध्वनि उत्पन्न होती है। यही ध्वनि आगे चलकर भजन, मंत्र और संगीत का रूप लेती है।

संतों और महापुरुषों ने संगीत को ईश्वर प्राप्ति का सरल मार्ग माना है। उनके लिए संगीत मनोरंजन नहीं, आत्मा का जागरण था।


चेतना का जागरण और संगीत का संबंध

जब मन विकारों, क्रोध, लोभ और अहंकार से भरा होता है, तब संगीत केवल ध्वनि बनकर रह जाता है।

लेकिन जब हृदय निर्मल होने लगता है—

  • करुणा जागती है
  • प्रेम बढ़ता है
  • अहंकार कम होता है
  • मन शांत होता है

तब वही स्वर आत्मा को स्पर्श करने लगते हैं।

सच्चा संगीत बाहर नहीं, भीतर जन्म लेता है।

इसीलिए कहा गया है कि स्वर कंठ से नहीं, हृदय से उठते हैं।


कठिन शब्दों का सरल अर्थ

1. चेतना

हमारे भीतर उपस्थित जागरूकता या आत्मिक शक्ति।

2. जागरण

अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ना और भीतर की समझ का विकसित होना।

3. नाद

दिव्य ध्वनि या आध्यात्मिक कंपन।

4. साधना

नियमित अभ्यास जिसके माध्यम से मन और आत्मा का विकास होता है।

5. गुरु

वह जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए।


गुरु क्यों आवश्यक हैं?

जीवन में बहुत सी बातें पुस्तकों से सीखी जा सकती हैं, लेकिन अनुभव का ज्ञान गुरु से ही प्राप्त होता है।

गुरु—

  • दिशा देते हैं
  • साधना का मार्ग बताते हैं
  • भ्रम दूर करते हैं
  • आत्मविश्वास जगाते हैं

जिस प्रकार नदी को समुद्र तक पहुँचने के लिए मार्ग चाहिए, उसी प्रकार साधक को आत्मिक उन्नति के लिए गुरु की आवश्यकता होती है।

गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, वे जीवन को सुर में ढालते हैं।


प्रेरणादायक कथा: जब एक साधारण गायक संत बन गया

बहुत समय पहले एक युवक को संगीत से अत्यंत प्रेम था। वह सुंदर स्वर में गाता था, लेकिन उसके गीत लोगों को प्रभावित नहीं कर पाते थे।

एक दिन उसकी भेंट एक संत से हुई।

संत ने कहा—

"तुम्हारे स्वर मधुर हैं, लेकिन तुम्हारा हृदय अभी मौन नहीं हुआ है।"

युवक ने पूछा—

"क्या संगीत सीखने के लिए और अभ्यास करना होगा?"

संत मुस्कुराए और बोले—

"स्वरों का अभ्यास तो आवश्यक है, पर उससे पहले मन को शांत करना सीखो।"

युवक ने वर्षों तक सेवा, ध्यान और भजन किया।

धीरे-धीरे उसके भीतर विनम्रता और करुणा का विकास हुआ।

जब उसने पुनः गाना प्रारंभ किया तो लोगों की आँखों में आँसू आ जाते थे। अब उसके स्वर केवल कानों तक नहीं, हृदय तक पहुँचते थे।

उसे समझ आ गया कि संगीत की शक्ति तकनीक में नहीं, आत्मा की पवित्रता में छिपी है।


वर्तमान जीवन में इसका महत्व

1. तनाव कम करने में सहायक

जब हम भजन, मंत्र या ध्यानपूर्ण संगीत सुनते हैं, तो मन की अशांति धीरे-धीरे कम होने लगती है।

2. भय को दूर करता है

ईश्वर-स्मरण और आध्यात्मिक संगीत मन में सुरक्षा और विश्वास का भाव जगाते हैं।

3. असफलता से उबरने में मदद करता है

संगीत मन को सकारात्मक ऊर्जा देता है और पुनः प्रयास करने की प्रेरणा देता है।

4. मानसिक शांति प्रदान करता है

नियमित भजन और ध्यान मन को स्थिर बनाते हैं।

5. आत्मविश्वास बढ़ाता है

जब व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति से जुड़ता है, तब बाहरी परिस्थितियाँ उसे आसानी से विचलित नहीं कर पातीं।


सरल साधना: हृदय में सुर-गंगा प्रवाहित करने का उपाय

प्रतिदिन सुबह 10 मिनट यह अभ्यास करें—

चरण 1

शांत स्थान पर बैठें।

चरण 2

आँखें बंद करके गहरी श्वास लें।

चरण 3

मन ही मन 108 बार जप करें—

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

या

"ॐ नमः शिवाय"

चरण 4

इसके बाद किसी एक भजन को भावपूर्वक सुनें।

चरण 5

संगीत को सुनने के बजाय उसे अनुभव करने का प्रयास करें।

कुछ ही दिनों में मन की शांति और स्थिरता का अनुभव होने लगेगा।


निष्कर्ष

संगीत केवल कला नहीं, आत्मा का उत्सव है। जब चेतना जागती है, तब स्वर प्रार्थना बन जाते हैं और जीवन साधना।

सच्चा संगीत वही है जो हमें स्वयं से जोड़ दे, हमारे भीतर करुणा जगाए और हमें ईश्वर की ओर ले जाए।

यदि हम अपने हृदय को निर्मल बनाने का प्रयास करें, तो जीवन की प्रत्येक धड़कन में एक दिव्य राग सुनाई देने लगेगा।

आज स्वयं से एक प्रश्न पूछिए—

क्या मैं केवल संगीत सुन रहा हूँ, या अपने भीतर बहती सुर-गंगा को भी अनुभव कर रहा हूँ?


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. आध्यात्मिक संगीत क्या होता है?

आध्यात्मिक संगीत वह है जो मन को शांति, भक्ति और आत्मिक उन्नति की ओर ले जाए।

2. क्या संगीत वास्तव में ध्यान में सहायता करता है?

हाँ, भावपूर्ण भजन और मंत्र मन को एकाग्र करने तथा ध्यान की अवस्था में पहुँचने में सहायक होते हैं।

3. गुरु का संगीत साधना में क्या महत्व है?

गुरु साधक को सही दिशा देते हैं और संगीत को केवल कला नहीं, साधना के रूप में जीना सिखाते हैं।

4. क्या बिना संगीत सीखे आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है?

हाँ। भक्ति, मंत्र-जप और भावपूर्ण श्रवण के माध्यम से भी आध्यात्मिक अनुभव संभव है।

5. संगीत और मानसिक शांति का क्या संबंध है?

मधुर एवं आध्यात्मिक संगीत मन की अशांति कम करता है, तनाव घटाता है और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

6. "नाद ब्रह्म" का क्या अर्थ है?

नाद ब्रह्म का अर्थ है कि समस्त सृष्टि का मूल स्वरूप दिव्य ध्वनि या कंपन है।

7. आध्यात्मिक जागरण के लिए कौन सा मंत्र लाभकारी है?

"ॐ नमः शिवाय", "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" तथा गायत्री मंत्र का नियमित जप अत्यंत लाभकारी माना जाता है। 

क्या संगीत केवल मनोरंजन है या आत्मा का मार्ग?

आज का मनुष्य पहले से अधिक सुविधाओं से घिरा हुआ है, लेकिन भीतर से पहले से अधिक अशांत भी है। मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार ने हमें बाहरी दुनिया से तो जोड़ दिया है, परंतु स्वयं से दूर कर दिया है। मन में तनाव है, भविष्य का भय है, असफलता की पीड़ा है और संबंधों में बढ़ती दूरी है।

ऐसे समय में जब जीवन का शोर बढ़ता जाता है, तब आत्मा किसी मधुर स्वर की तलाश करती है। यही कारण है कि सदियों से संत, ऋषि और महापुरुष संगीत को केवल कला नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा मानते आए हैं।

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में संगीत को "नाद ब्रह्म" कहा गया है। अर्थात् वह दिव्य ध्वनि जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। लेकिन यह संगीत केवल कानों से सुनने की वस्तु नहीं है। इसे अनुभव करने के लिए हृदय का जागृत होना आवश्यक है।

जब भीतर प्रेम जागता है, जब मन निर्मल होता है, जब अहंकार शांत होता है, तब जीवन का प्रत्येक क्षण संगीत बन जाता है।

यह लेख हमें समझाएगा कि संगीत का आध्यात्मिक महत्व क्या है, गुरु की भूमिका क्यों आवश्यक है, चेतना का जागरण कैसे होता है और आधुनिक जीवन में यह ज्ञान हमें कैसे शांति प्रदान कर सकता है।


संगीत का वास्तविक अर्थ क्या है?

सामान्यतः हम संगीत को गीत, भजन, वाद्ययंत्र या मनोरंजन के रूप में देखते हैं। लेकिन भारतीय दर्शन संगीत को इससे कहीं अधिक गहराई से समझता है।

संगीत केवल स्वरों का संयोजन नहीं है।

संगीत वह है—

  • जो मन को शांत करे
  • जो हृदय को कोमल बनाए
  • जो आत्मा को स्पर्श करे
  • जो मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाए

जब स्वर केवल कानों तक पहुँचते हैं, तब वह मनोरंजन होता है।

जब वही स्वर हृदय तक पहुँचते हैं, तब वह संगीत बनता है।

और जब वही संगीत आत्मा को छू लेता है, तब वह साधना बन जाता है।


शास्त्रों में संगीत का महत्व

भारतीय संस्कृति में संगीत का इतिहास अत्यंत प्राचीन है।

चारों वेदों में से सामवेद को संगीत का आधार माना जाता है।

ऋषियों ने अनुभव किया कि सम्पूर्ण सृष्टि ध्वनि से बनी है। प्रत्येक ग्रह, प्रत्येक तारा और प्रत्येक जीव अपने भीतर एक विशेष कंपन रखता है।

इसी अनुभव के आधार पर कहा गया—

"नादः ब्रह्म"

अर्थात् नाद ही ब्रह्म है।

हमारे मंदिरों की घंटियाँ, शंखध्वनि, मंत्रोच्चार और भजन इसी नाद विज्ञान का हिस्सा हैं।

इनका उद्देश्य केवल धार्मिक परंपरा निभाना नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना को ऊँचा उठाना है।


चेतना क्या है?

बहुत से लोग चेतना शब्द सुनते हैं लेकिन उसका अर्थ स्पष्ट नहीं समझते।

सरल भाषा में चेतना का अर्थ है—

हमारे भीतर की जागरूकता।

जब हम केवल शरीर तक सीमित रहते हैं, तब हमारी चेतना सीमित होती है।

जब हम मन को समझने लगते हैं, तब चेतना विकसित होती है।

और जब हम आत्मा का अनुभव करने लगते हैं, तब चेतना जागृत होने लगती है।

चेतना का जागरण किसी चमत्कार का परिणाम नहीं होता।

यह धीरे-धीरे होने वाली एक आंतरिक प्रक्रिया है।


संगीत और चेतना का संबंध

संगीत का प्रभाव केवल कानों पर नहीं पड़ता।

विज्ञान भी स्वीकार करता है कि संगीत हमारे मस्तिष्क, भावनाओं और मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है।

लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि इससे भी आगे जाती है।

जब मनुष्य का हृदय शुद्ध होता है—

  • संगीत अधिक गहराई से अनुभव होता है
  • भजन सुनते समय आँखें नम हो जाती हैं
  • मंत्रों में शक्ति अनुभव होने लगती है
  • मन स्वतः शांत होने लगता है

इस अवस्था में संगीत केवल ध्वनि नहीं रहता।

वह ध्यान बन जाता है।

वह प्रार्थना बन जाता है।

वह ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बन जाता है।


स्वर कंठ से नहीं, हृदय से उठते हैं

यह एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक सत्य है।

बहुत से लोग सुंदर गाते हैं, लेकिन सभी के गीत हृदय को नहीं छूते।

क्यों?

क्योंकि संगीत की वास्तविक शक्ति तकनीक में नहीं, भावना में छिपी होती है।

जब हृदय में प्रेम होता है—

स्वर जीवंत हो जाते हैं।

जब हृदय में करुणा होती है—

स्वर में मधुरता आ जाती है।

जब हृदय में भक्ति होती है—

स्वर प्रार्थना बन जाते हैं।

इसलिए संत कहते हैं—

"पहले हृदय को साधो, फिर स्वर अपने आप साध जाएंगे।"


गुरु का महत्व क्यों है?

आज इंटरनेट पर हजारों पुस्तकें और वीडियो उपलब्ध हैं।

फिर भी आध्यात्मिक मार्ग में गुरु की आवश्यकता क्यों बताई जाती है?

क्योंकि ज्ञान और अनुभव अलग-अलग बातें हैं।

किसी पुस्तक से तैरना नहीं सीखा जा सकता।

उसी प्रकार आत्मिक अनुभव केवल पढ़कर प्राप्त नहीं होता।

गुरु—

  • मार्ग दिखाते हैं
  • भ्रम दूर करते हैं
  • आत्मविश्वास बढ़ाते हैं
  • साधना की दिशा बताते हैं

गुरु का कार्य केवल जानकारी देना नहीं है।

वे साधक के भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत करते हैं।


गुरु और शिष्य का आध्यात्मिक संबंध

गुरु और शिष्य का संबंध सामान्य शिक्षा से अलग होता है।

विद्यालय में शिक्षक हमें विषय सिखाते हैं।

लेकिन गुरु हमें स्वयं से मिलाते हैं।

वे हमें बताते हैं—

  • हम कौन हैं?
  • जीवन का उद्देश्य क्या है?
  • दुःख का कारण क्या है?
  • शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है?

जब शिष्य श्रद्धा और समर्पण से गुरु के मार्ग पर चलता है, तब उसका जीवन धीरे-धीरे बदलने लगता है।


एक प्रेरणादायक कथा: संगीत से आत्म-जागरण तक

बहुत समय पहले एक युवक था जिसे संगीत से अत्यधिक प्रेम था।

उसने वर्षों तक गायन सीखा।

उसका स्वर मधुर था।

लोग उसकी प्रशंसा करते थे।

लेकिन उसके भीतर शांति नहीं थी।

वह क्रोध, अहंकार और असंतोष से भरा हुआ था।

एक दिन उसकी मुलाकात एक संत से हुई।

संत ने उसका गायन सुना।

फिर मुस्कुराकर पूछा—

"तुम संगीत सीख चुके हो, लेकिन क्या तुमने मौन सीखा है?"

युवक आश्चर्यचकित रह गया।

उसने पूछा—

"मौन का संगीत से क्या संबंध है?"

संत बोले—

"जब तक मन शोर से भरा रहेगा, तब तक संगीत केवल ध्वनि रहेगा।"

युवक ने संत के साथ रहकर सेवा, ध्यान और साधना प्रारंभ की।

धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलने लगा।

अहंकार कम हुआ।

करुणा बढ़ी।

मन शांत होने लगा।

कुछ वर्षों बाद जब उसने पुनः गाना शुरू किया, तो लोग केवल सुनते नहीं थे, बल्कि अनुभव करते थे।

उसके स्वरों में आत्मा की सुगंध आ गई थी।

अब संगीत कला नहीं, साधना बन चुका था।


सुर-गंगा में स्नान का वास्तविक अर्थ

आध्यात्मिक साहित्य में अक्सर "सुर-गंगा" जैसे शब्द मिलते हैं।

इसका अर्थ किसी बाहरी नदी से नहीं है।

सुर-गंगा का अर्थ है—

हृदय में बहने वाली दिव्य संगीत धारा।

जब व्यक्ति—

  • सत्य बोलता है
  • संयम रखता है
  • करुणा अपनाता है
  • भक्ति करता है

तब उसके भीतर सुर-गंगा प्रवाहित होने लगती है।

यही आंतरिक पवित्रता संगीत को दिव्यता प्रदान करती है।


साधना के चार आधार

1. अनुशासन

बिना अनुशासन के कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती।

प्रतिदिन निश्चित समय पर ध्यान, जप या भजन करना आवश्यक है।

2. धैर्य

आध्यात्मिक विकास धीरे-धीरे होता है।

बीज बोते ही वृक्ष नहीं बनता।

उसी प्रकार साधना का फल समय के साथ मिलता है।

3. श्रद्धा

श्रद्धा आध्यात्मिक मार्ग की ऊर्जा है।

जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ साधना जीवित रहती है।

4. समर्पण

जब व्यक्ति परिणाम की चिंता छोड़कर अभ्यास करता है, तब वास्तविक परिवर्तन प्रारंभ होता है।


आधुनिक जीवन में संगीत साधना का महत्व

आज अधिकांश लोग मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं।

ऐसे में संगीत साधना अत्यंत उपयोगी हो सकती है।

तनाव कम करती है

मधुर भजन और मंत्र मन की गति को धीमा करते हैं।

भय दूर करती है

ईश्वर-स्मरण व्यक्ति के भीतर सुरक्षा का भाव जगाता है।

आत्मविश्वास बढ़ाती है

साधना व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्ति से जोड़ती है।

नकारात्मकता कम करती है

सकारात्मक ध्वनियाँ मन के वातावरण को बदल देती हैं।

मानसिक शांति देती है

नियमित भजन और ध्यान से मन स्थिर होता है।


दैनिक जीवन में अपनाने योग्य सरल साधना

यदि आप आध्यात्मिक संगीत का अनुभव करना चाहते हैं, तो यह सरल अभ्यास करें।

सुबह का अभ्यास

  • स्नान के बाद शांत स्थान पर बैठें।
  • तीन मिनट गहरी श्वास लें।
  • आँखें बंद करें।
  • मन ही मन "ॐ" का जप करें।

मंत्र जप

108 बार जप करें—

ॐ नमः शिवाय

या

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भजन श्रवण

10 मिनट किसी एक भक्ति गीत को ध्यानपूर्वक सुनें।

केवल सुनें नहीं।

उसे अनुभव करें।


आंतरिक संगीत को पहचानने के संकेत

जब साधना गहरी होने लगती है, तब कुछ परिवर्तन दिखाई देते हैं—

  • क्रोध कम होने लगता है
  • मन शांत रहने लगता है
  • छोटी बातों पर दुख नहीं होता
  • दूसरों के प्रति करुणा बढ़ती है
  • अकेलापन कम महसूस होता है
  • भक्ति में आनंद मिलने लगता है

ये संकेत बताते हैं कि चेतना का विकास हो रहा है।


क्या हर व्यक्ति आध्यात्मिक संगीत का अनुभव कर सकता है?

हाँ।

यह किसी विशेष जाति, धर्म, भाषा या आयु तक सीमित नहीं है।

ईश्वर ने सभी को समान हृदय दिया है।

जिस व्यक्ति में प्रेम, श्रद्धा और साधना की इच्छा है, वह इस मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप कितना जानते हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि आप कितनी सच्चाई से प्रयास करते हैं।


निष्कर्ष: जब जीवन स्वयं संगीत बन जाता है

संगीत केवल सुनने की वस्तु नहीं है।

यह जीने की कला है।

जब चेतना जागती है, तब प्रत्येक श्वास में संगीत सुनाई देता है।

जब हृदय प्रेम से भरता है, तब प्रत्येक शब्द भजन बन जाता है।

जब जीवन में साधना आती है, तब प्रत्येक दिन एक नई आध्यात्मिक यात्रा बन जाता है।

सच्चा संगीत वही है जो हमें स्वयं से मिलाए।

जो हमारे भीतर छिपे प्रकाश को जगाए।

जो हमें प्रेम, करुणा और शांति की ओर ले जाए।

आज कुछ क्षण मौन में बैठिए और अपने हृदय से पूछिए—

क्या मैं केवल बाहरी संगीत सुन रहा हूँ, या अपने भीतर बहती उस दिव्य सुर-गंगा को भी पहचान रहा हूँ?


Gghhh

सुर-गंगा दोहावली | कबीर शैली

🕉️ सुर-गंगा दोहावली 🕉️

संगीत • साधना • गुरु • आत्म-जागरण

🪔
कंठ गाए जग जीत ले, मन रह जाए दूर। हिय में जागे प्रेम जब, तब उपजे सच्चा सूर॥
सुर न निकसे कंठ से, सुर निकसे मन माहिं। निर्मल हृदय सरोवरै, संगीत बसै तहिं॥
बाहर खोजे राग को, भीतर झांके नाहिं। घट-घट वीणा बज रही, सुनै विरला काहिं॥
गुरु बिन सुर की साधना, जैसे दीपक धूल। मारग जाने कौन फिर, जब न मिले उसूल॥
सुर-गंगा बहती सदा, अंतर की परधार। मलिन हृदय नहिं जानता, निर्मल पाए पार॥
मन मंदिर में मौन हो, तब झंकारे तान। शब्द-शब्द हरि बोलते, जागे अंतर-ज्ञान॥
राग वही जो प्रेम का, छू ले अंतर-तार। बाकी सब व्यापार है, गूंजे बारंबार॥
गुरु की दृष्टि पड़त ही, खुलें हृदय के द्वार। अंधियारे के बीच में, फूटे ज्ञान उजियार॥
भजन न केवल गीत है, भजन न केवल छंद। जीवन जब समर्पित हो, तब हो हरि का बंद॥
माला फेरे हाथ में, मन दौड़े दस ठौर। एक सुरत हरि में लगे, तब मिले चित-चोर॥
तन का गाना और है, मन का गाना और। आतम गाए प्रेम से, तब खुलते हैं भोर॥
नाद अनाहत गूंजता, सुन ले अपने माहिं। द्वार-द्वार मत भटक तू, साहिब तेरे पासहीं॥
अंतर बैठे लाल को, जग में खोजे लोग। कस्तूरी मृग सा फिरे, लेकर मन का रोग॥
साधन-साधन सब कहें, साधे कौन विवेक। मन के मैल उतार ले, मिल जाए अभिषेक॥
जप-तप सब निष्फल लगे, यदि बढ़ता अभिमान। झुके जहाँ मन प्रेम से, वहीं बसे भगवान॥
सुर का पहला पाठ है, करुणा भर ले प्राण। दूजे पाठ में प्रेम है, तीजे में भगवान॥
वीणा, शंख, मृदंग क्या, क्या बंसी की तान। जागे न यदि प्रेम मन, सब ध्वनि है अजान॥
सुरपुरी का वास है, निर्मल मन के बीच। लोभ-मोह की धूल से, नाहिं मिले वह नीच॥
चेतन दीपक जल उठे, मिटे भ्रमों की रात। अंतर आंगन खिल उठे, जैसे प्रभु की बात॥
असफलता से मत डरे, मत डर जीवन-हार। टूटी बंसी में भी बजे, प्रभु का मधुर सितार॥
तनावों की धूप में, मन हो जाए शुष्क। नाम-सुरों की वर्षा कर, हो जीवन फिर पुष्ट॥
भय के काले मेघ जब, घेरें चारों ओर। हरि-स्मरण की एक धुन, कर दे उजला भोर॥
मौन बने जब साधना, श्वास बने जब गान। तब हर धड़कन कह उठे, तू ही है भगवान॥
सुर-गंगा में जो नहा, धुल जाए अहंकार। वही सुने अनहद धुनि, वही उतरे पार॥
गुरु मिल जाए भाग से, मत करना अभिमान। सेवा, श्रद्धा, प्रेम से, रखना उनका मान॥
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, सुर का भेद न पाय। एक करुणा की तान से, साहिब मिले समाय॥
मन वीणा के तार को, पहले करना ठीक। फिर चाहे जो राग छेड़, हर स्वर होगा ठीक॥
सच्चा गायक वह नहीं, जो गाए दिन-रात। सच्चा गायक वह बने, जो जाने मन की बात॥
प्रेम-दीप जब जल उठे, मिटे विकार तमाम। तब संगीत स्वयं कहे, हरि का पावन नाम॥
कहै साधक सुन रे मन, छोड़ जगत की भीड़। अंतर बैठा गा रहा, तेरा साहिब पीर॥
🕉️ “जहाँ प्रेम है, वहीं संगीत है; जहाँ संगीत है, वहीं ईश्वर है।” 🕉️

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