श्री विष्णु सहस्रनाम भाग ५-८ | नाम २१–४० का शब्दार्थ, आध्यात्मिक अर्थ और व्याख्या
- डॉ संजय कुमार पवार
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| श्री विष्णु सहस्रनाम भाग १-८ – भगवान विष्णु के दिव्य नाम २१–४० का आध्यात्मिक अर्थ। |
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ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ५
२१. नारसिंहवपुः
शब्दार्थ :
नर और सिंह के संयुक्त दिव्य स्वरूप वाले।
नर और सिंह के संयुक्त दिव्य स्वरूप वाले।
भगवान ने भक्त प्रह्लाद की रक्षा और हिरण्यकशिपु के विनाश के लिए नरसिंह अवतार धारण किया। यह नाम भक्त-रक्षा, धर्म-स्थापना और अधर्म के विनाश का प्रतीक है।
२२. श्रीमान्
शब्दार्थ :
जो श्री (महालक्ष्मी) से सदैव युक्त हैं।
जो श्री (महालक्ष्मी) से सदैव युक्त हैं।
भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न और महालक्ष्मी का निवास माना जाता है। वे ऐश्वर्य, करुणा, मंगल और समृद्धि के अनन्त स्रोत हैं।
२३. केशवः
शब्दार्थ :
केशी नामक असुर का वध करने वाले; अथवा सुन्दर केशों वाले।
केशी नामक असुर का वध करने वाले; अथवा सुन्दर केशों वाले।
'केशव' नाम के अनेक अर्थ हैं। एक प्रसिद्ध अर्थ है—केशी असुर का संहार करने वाले। वैष्णव परम्परा में यह भगवान का अत्यन्त प्रिय और पूजनीय नाम है।
२४. पुरुषोत्तमः
शब्दार्थ :
समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ; परम पुरुष।
समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ; परम पुरुष।
भगवान क्षर (नश्वर) और अक्षर (अविनाशी जीव) दोनों से परे परम पुरुष हैं। इसलिए उन्हें 'पुरुषोत्तम' कहा गया है।
२५. सर्वः
शब्दार्थ :
जो सब कुछ हैं; सर्वव्यापक।
जो सब कुछ हैं; सर्वव्यापक।
समस्त जगत उन्हीं से उत्पन्न होता है, उन्हीं में स्थित रहता है और अन्ततः उन्हीं में लीन हो जाता है। इसलिए वे 'सर्वः' कहलाते हैं—अर्थात् सबके रूप में विद्यमान परमात्मा।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ६
२६. शर्वः
शब्दार्थ :
जो समस्त दुःखों और बन्धनों का नाश करते हैं।
जो समस्त दुःखों और बन्धनों का नाश करते हैं।
'शर्व' का एक अर्थ है विनाश करने वाला। यहाँ इसका तात्पर्य है कि भगवान विष्णु अज्ञान, पाप और संसार के बन्धनों का नाश कर जीव को मोक्ष के मार्ग पर ले जाते हैं।
२७. शिवः
शब्दार्थ :
कल्याणस्वरूप, मंगलमय।
कल्याणस्वरूप, मंगलमय।
'शिव' का अर्थ है परम मंगलकारी। भगवान विष्णु अपने भक्तों के जीवन में शान्ति, धर्म, करुणा और परम कल्याण का संचार करते हैं।
२८. स्थाणुः
शब्दार्थ :
अचल, स्थिर, अविचल।
अचल, स्थिर, अविचल।
भगवान समय, परिवर्तन और विनाश से परे हैं। वे नित्य, स्थिर और अपरिवर्तनशील परम सत्य हैं।
२९. भूतादिः
शब्दार्थ :
समस्त प्राणियों का आदि कारण।
समस्त प्राणियों का आदि कारण।
समस्त चराचर जगत की उत्पत्ति भगवान से होती है। वे सभी जीवों और पंचमहाभूतों के मूल कारण हैं।
३०. निधिरव्ययः
शब्दार्थ :
अक्षय निधि; जिसका दिव्य ऐश्वर्य कभी समाप्त नहीं होता।
अक्षय निधि; जिसका दिव्य ऐश्वर्य कभी समाप्त नहीं होता।
भगवान अनन्त ज्ञान, शक्ति, करुणा, प्रेम और ऐश्वर्य के अविनाशी भण्डार हैं। उनकी कृपा और दिव्य सम्पदा कभी क्षीण नहीं होती।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ७
३१. सम्भवः
शब्दार्थ :
जो अपनी इच्छा से अवतरित होते हैं।
जो अपनी इच्छा से अवतरित होते हैं।
भगवान धर्म की रक्षा, भक्तों के कल्याण और अधर्म के नाश के लिए समय-समय पर अवतार धारण करते हैं। उनका अवतरण कर्म के बन्धन से नहीं, बल्कि उनकी दिव्य इच्छा से होता है।
३२. भावनः
शब्दार्थ :
पालन-पोषण करने वाले, उन्नति देने वाले।
पालन-पोषण करने वाले, उन्नति देने वाले।
भगवान सभी जीवों का पालन करते हैं, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करते हैं।
३३. भर्ता
शब्दार्थ :
धारण करने वाले, पालनकर्ता।
धारण करने वाले, पालनकर्ता।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान की शक्ति से संचालित होता है। वे ही पृथ्वी, आकाश, देवताओं और समस्त प्राणियों के वास्तविक आधार और पालनकर्ता हैं।
३४. प्रभवः
शब्दार्थ :
समस्त सृष्टि का मूल उद्गम।
समस्त सृष्टि का मूल उद्गम।
सम्पूर्ण जगत भगवान से प्रकट होता है। वे सभी कारणों के कारण हैं और सृष्टि का प्रारम्भ उन्हीं से होता है।
३५. प्रभुः
शब्दार्थ :
सर्वशक्तिमान स्वामी।
सर्वशक्तिमान स्वामी।
भगवान सम्पूर्ण सृष्टि के परम स्वामी हैं। उनकी शक्ति, ज्ञान और शासन अनन्त है। देवता, मनुष्य और सम्पूर्ण जगत उनके अधीन हैं।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ८
३६. ईश्वरः
शब्दार्थ :
सर्वशक्तिमान स्वामी; सम्पूर्ण जगत के नियन्ता।
सर्वशक्तिमान स्वामी; सम्पूर्ण जगत के नियन्ता।
भगवान विष्णु सम्पूर्ण सृष्टि के परम ईश्वर हैं। वे सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के परम नियन्ता हैं तथा सभी देवताओं के भी अधिपति हैं।
३७. स्वयम्भूः
शब्दार्थ :
जो स्वयं से प्रकट हैं; जिनका कोई कारण नहीं।
जो स्वयं से प्रकट हैं; जिनका कोई कारण नहीं।
भगवान का अस्तित्व किसी अन्य पर निर्भर नहीं है। वे अनादि, अनन्त और स्वयंप्रकाश हैं। समस्त कारणों के भी वे ही कारण हैं।
३८. शम्भुः
शब्दार्थ :
सुख और कल्याण प्रदान करने वाले।
सुख और कल्याण प्रदान करने वाले।
'शम्भु' का अर्थ है जो अपने भक्तों को मंगल, शान्ति और आनन्द प्रदान करें। भगवान विष्णु का स्मरण मन को स्थिर और जीवन को धर्ममय बनाता है।
३९. आदित्यः
शब्दार्थ :
अदिति के पुत्र; सूर्य के समान तेजस्वी।
अदिति के पुत्र; सूर्य के समान तेजस्वी।
भगवान ने वामन अवतार में अदिति के पुत्र के रूप में अवतार लिया, इसलिए वे 'आदित्य' कहलाते हैं। वे समस्त जगत को ज्ञानरूपी प्रकाश प्रदान करते हैं।
४०. पुष्कराक्षः
शब्दार्थ :
कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले।
कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले।
भगवान के नेत्र करुणा, प्रेम और दिव्य सौन्दर्य के प्रतीक हैं। वे अपने भक्तों पर सदैव कृपादृष्टि बनाए रखते हैं और उन्हें धर्म के मार्ग पर प्रेरित करते हैं।

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