मणिकर्णिका महाश्मशान का रहस्य: काशी में मृत्यु क्यों देती है मोक्ष? | भगवान शिव का तारक मंत्र


महाश्मशान मणिकर्णिका का रहस्य: क्यों स्वयं भगवान शिव देते हैं मोक्ष का तारक मंत्र?

मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच दिव्य स्वरूप में भगवान शिव, काशी में मोक्ष और तारक मंत्र का प्रतीकात्मक दृश्य।
महाश्मशान मणिकर्णिका पर दिव्य ज्योति के मध्य मोक्ष का संदेश देते भगवान शिव।

- डॉ संजय कुमारपवार

भूमिका

आज का मनुष्य भय, तनाव, असुरक्षा और जीवन की अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है। मृत्यु का नाम सुनते ही मन में अनेक प्रश्न उठने लगते हैं। क्या मृत्यु अंत है? क्या आत्मा का कोई गंतव्य है? क्या वास्तव में मोक्ष संभव है?

सनातन परंपरा में काशी को केवल एक नगर नहीं, बल्कि मुक्ति का द्वार माना गया है। कहा जाता है कि यहाँ मृत्यु भी उत्सव बन जाती है, क्योंकि इस भूमि पर स्वयं भगवान शिव जीव को ब्रह्मज्ञान का उपदेश देकर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करते हैं।

महाश्मशान मणिकर्णिका और काशीवास का रहस्य केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि आत्मा की अंतिम यात्रा का गहन आध्यात्मिक विज्ञान है।


काशी: भगवान शिव की प्रिय नगरी

शास्त्रों में काशी को अविनाशी नगरी कहा गया है। मान्यता है कि प्रलय काल में भी यह नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर सुरक्षित रहती है।

भगवान शिव कहते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक कण उन्हें प्रिय है, परन्तु काशी उनकी परम प्रिय नगरी है। यहाँ आने वाला प्रत्येक जीव अनेक जन्मों के संचित कर्मों का क्षय करके ही इस दुर्लभ अवसर को प्राप्त करता है।

कठिन शब्दों का सरल अर्थ

  • महाश्मशान – वह स्थान जहाँ निरंतर अंतिम संस्कार होते हों।
  • तारक मंत्र – ऐसा दिव्य मंत्र जो आत्मा को संसार-सागर से पार कर दे।
  • मोक्ष – जन्म और मृत्यु के चक्र से पूर्ण मुक्ति।
  • संस्कार – कर्मों के सूक्ष्म प्रभाव जो आत्मा के साथ जुड़े रहते हैं।

काशीवास क्यों माना गया है महान तपस्या?

शास्त्रों के अनुसार काशी में निवास करना स्वयं एक तप है।

काशी की उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान को—

  • व्रत के समान,
  • दान के समान,
  • यम-नियम के पालन के समान,
  • और साधना के समान माना गया है।

यहाँ का वातावरण निरंतर आत्मचिंतन, वैराग्य और ईश्वर-स्मरण की प्रेरणा देता है।

जब मनुष्य काशीवास की तपस्या पूर्ण करता है, तब उसके भीतर संसार की अस्थायी वस्तुओं के प्रति मोह कम होने लगता है और आत्मा परम सत्य की ओर अग्रसर होती है।


मणिकर्णिका: जहाँ मृत्यु भी मुक्ति का उत्सव बन जाती है

मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान कहा जाता है। यहाँ चिताएँ कभी शांत नहीं होतीं।

सामान्य दृष्टि से देखने पर यह स्थान भय उत्पन्न कर सकता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह संसार की सबसे बड़ी शिक्षा देता है—

जो आया है उसे जाना है।

यहाँ जलती हुई चिताएँ मनुष्य को स्मरण कराती हैं कि धन, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार सब यहीं रह जाने वाले हैं।

इसी सत्य का बोध ही आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी है।


तारक मंत्र और भगवान शिव का अनुग्रह

सनातन परंपरा में यह विश्वास है कि काशी में देह त्यागने वाले जीव को स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं।

यह मंत्र केवल शब्द नहीं है, बल्कि आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराने वाली दिव्य चेतना है।

जब जीव अंतिम क्षणों में भगवान शिव की कृपा प्राप्त करता है, तब उसके संचित कर्मों के बंधन समाप्त होने लगते हैं और आत्मा परम शांति की ओर अग्रसर होती है।

यही कारण है कि काशी को "मोक्षदायिनी नगरी" कहा गया है।


एक प्रेरणादायक कथा

बहुत समय पहले एक वृद्ध साधक जीवनभर सांसारिक संघर्षों में उलझा रहा। वृद्धावस्था में उसे यह अनुभव हुआ कि उसने धन तो बहुत कमाया, परंतु मन की शांति नहीं पाई।

वह ईश्वर-स्मरण करते हुए एक पवित्र तीर्थ में रहने लगा। वहाँ उसने देखा कि लोग मृत्यु से नहीं, बल्कि अधूरे जीवन से अधिक भयभीत हैं।

धीरे-धीरे उसने प्रतिदिन नाम-जप, सेवा और ध्यान आरंभ किया।

कुछ वर्षों बाद उसके चेहरे पर अद्भुत शांति दिखाई देने लगी। जब उसके जीवन का अंतिम समय आया, तब उसके मुख पर भय नहीं, बल्कि मुस्कान थी।

उसने कहा—

"जिस सत्य से मैं जीवनभर भागता रहा, वही आज मेरा सबसे बड़ा मित्र बन गया है।"

यह कथा सिखाती है कि मोक्ष केवल मृत्यु के बाद की घटना नहीं, बल्कि जीवन में ही प्राप्त होने वाली आंतरिक स्वतंत्रता है।


वर्तमान जीवन में इसका महत्व

1. तनाव कम करता है

जब हम जीवन की नश्वरता को समझते हैं, तब छोटी-छोटी बातों का तनाव स्वतः कम होने लगता है।

2. भय दूर करता है

मृत्यु का ज्ञान हमें जीवन को अधिक सार्थक ढंग से जीना सिखाता है।

3. असफलता से उबारता है

जो व्यक्ति आत्मा के शाश्वत स्वरूप को समझ लेता है, वह असफलताओं से टूटता नहीं।

4. मानसिक शांति देता है

ईश्वर-स्मरण और वैराग्य मन को स्थिर बनाते हैं।

5. आत्मविश्वास बढ़ाता है

जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतना मानता है, तब उसके भीतर अद्भुत आत्मबल जागृत होता है।


सरल साधना और मंत्र

प्रतिदिन प्रातः या सायंकाल श्रद्धा से यह मंत्र जपें—

"ॐ नमः शिवाय"

साधना विधि

  • शांत स्थान पर बैठें।
  • भगवान शिव का स्मरण करें।
  • 108 बार मंत्र जप करें।
  • अंत में समस्त प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।

यह साधना मन को स्थिरता, साहस और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है।


निष्कर्ष

महाश्मशान मणिकर्णिका हमें मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन का सत्य सिखाती है। काशीवास केवल किसी स्थान पर रहना नहीं, बल्कि ऐसी चेतना में प्रवेश करना है जहाँ आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सके।

जब मनुष्य यह समझ लेता है कि सब कुछ नश्वर है और केवल परमात्मा शाश्वत है, तभी उसके भीतर वास्तविक शांति का जन्म होता है।

आज स्वयं से एक प्रश्न पूछिए—

क्या मैं केवल जीवन जी रहा हूँ, या जीवन के सत्य को भी जानने का प्रयास कर रहा हूँ?

यही प्रश्न आत्मज्ञान की ओर पहला कदम बन सकता है।


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान क्यों कहा जाता है?

क्योंकि यहाँ निरंतर अंतिम संस्कार होते रहते हैं और इसे मोक्ष प्रदान करने वाला पवित्र स्थल माना जाता है।

2. तारक मंत्र क्या होता है?

तारक मंत्र वह दिव्य मंत्र है जो आत्मा को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करने वाला माना जाता है।

3. काशी में मृत्यु को शुभ क्यों माना जाता है?

सनातन मान्यता के अनुसार काशी में देह त्यागने वाले जीव को भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

4. क्या केवल काशी जाने से मोक्ष मिल जाता है?

मोक्ष का मूल आधार ईश्वर-भक्ति, आत्मज्ञान, सद्कर्म और भगवान की कृपा है। काशी इन साधनाओं के लिए अत्यंत पवित्र भूमि मानी जाती है।

5. काशीवास का आध्यात्मिक महत्व क्या है?

काशीवास मनुष्य को वैराग्य, आत्मचिंतन, भक्ति और जीवन की वास्तविकता का अनुभव कराता है।

6. भगवान शिव का सबसे सरल मंत्र कौन-सा है?

"ॐ नमः शिवाय" को भगवान शिव का अत्यंत सरल और प्रभावशाली मंत्र माना जाता है।

7. क्या मृत्यु का चिंतन जीवन को नकारात्मक बनाता है?

नहीं। सनातन दर्शन में मृत्यु का स्मरण जीवन को अधिक सार्थक, जागरूक और आध्यात्मिक बनाने का माध्यम माना गया है। 

 क्या मृत्यु वास्तव में अंत है?

आज का मनुष्य आधुनिक सुविधाओं से घिरा हुआ है, लेकिन उसके भीतर भय, तनाव, असुरक्षा और भविष्य की चिंता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। धन, पद और प्रतिष्ठा पाने की दौड़ में हम जीवन का अधिकांश समय बिता देते हैं, परंतु एक प्रश्न ऐसा है जिससे कोई भी बच नहीं सकता—मृत्यु।

मृत्यु का नाम सुनते ही मन में भय उत्पन्न होता है। हम उसे जीवन का अंत मानते हैं। लेकिन सनातन धर्म का दृष्टिकोण इससे बिल्कुल भिन्न है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नए आध्यात्मिक द्वार के रूप में देखा है।

इसी रहस्य को समझाने के लिए भगवान शिव की नगरी काशी और महाश्मशान मणिकर्णिका का वर्णन किया जाता है। यहाँ मृत्यु शोक का विषय नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का उत्सव मानी जाती है। ऐसा क्यों? क्या वास्तव में भगवान शिव स्वयं जीव को तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं?

आइए इस गहन आध्यात्मिक रहस्य को सरल भाषा में समझते हैं।


काशी: केवल एक नगर नहीं, स्वयं भगवान शिव की चेतना

सनातन परंपरा में काशी को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित नगरी माना जाता है। इसे वाराणसी, बनारस और अविमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है।

शास्त्रों के अनुसार काशी कोई साधारण नगर नहीं है। यह वह भूमि है जिसे स्वयं भगवान शिव ने अपने निवास के लिए चुना।

कहा जाता है कि जब सृष्टि का प्रलय होता है और सम्पूर्ण जगत नष्ट हो जाता है, तब भी काशी सुरक्षित रहती है क्योंकि वह भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है।

इसीलिए काशी को "अविमुक्त क्षेत्र" कहा गया है, अर्थात ऐसा स्थान जिसे भगवान शिव कभी नहीं छोड़ते।

काशी शब्द का अर्थ

"काशी" शब्द संस्कृत की "काश" धातु से बना है जिसका अर्थ है—प्रकाश।

अर्थात काशी वह स्थान है जहाँ अज्ञान का अंधकार समाप्त होकर ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है।


भगवान शिव का काशी से विशेष प्रेम

पुराणों में वर्णित है कि भगवान शिव सम्पूर्ण ब्रह्मांड से प्रेम करते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि उन्हीं की अभिव्यक्ति है।

फिर भी काशी उन्हें विशेष प्रिय है।

क्यों?

क्योंकि यह वह भूमि है जहाँ जीव को आत्मज्ञान प्राप्त करने का सबसे बड़ा अवसर मिलता है।

यहाँ आने वाला व्यक्ति केवल धार्मिक यात्रा नहीं करता बल्कि जीवन के अंतिम सत्य के निकट पहुँचता है।

काशी का प्रत्येक घाट, प्रत्येक मंदिर और प्रत्येक गली मनुष्य को यही स्मरण कराती है—

"तुम शरीर नहीं, आत्मा हो।"


मणिकर्णिका घाट: संसार का सबसे अनोखा श्मशान

जब कोई पहली बार मणिकर्णिका घाट पहुँचता है तो वह आश्चर्यचकित रह जाता है।

यहाँ दिन हो या रात, चिताएँ निरंतर जलती रहती हैं।

जहाँ संसार मृत्यु से दूर भागता है, वहीं काशी में लोग मृत्यु को स्वीकार करना सीखते हैं।

मणिकर्णिका नाम कैसे पड़ा?

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने यहाँ हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। उस समय उनके शरीर से निकले स्वेद से एक कुंड बना।

कथा के अनुसार माता पार्वती का कर्णाभूषण (कर्णिका) इसी स्थान पर गिर गया था। इसलिए इस स्थान का नाम मणिकर्णिका पड़ा।

यह स्थान केवल एक घाट नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच का आध्यात्मिक सेतु माना जाता है।


महाश्मशान क्यों कहा जाता है?

सामान्य श्मशान केवल शरीर का अंतिम संस्कार करता है।

लेकिन मणिकर्णिका को महाश्मशान इसलिए कहा गया क्योंकि यहाँ केवल शरीर ही नहीं, बल्कि जीव के अनेक जन्मों के कर्मबंधन भी समाप्त होने की मान्यता है।

यहाँ जलती हुई चिताएँ हमें एक महान सत्य का दर्शन कराती हैं—

  • धन यहीं रह जाता है।
  • पद यहीं रह जाता है।
  • सौंदर्य यहीं रह जाता है।
  • अहंकार यहीं समाप्त हो जाता है।

जो बचता है, वह केवल आत्मा है।

यही कारण है कि संतों ने कहा—

"श्मशान संसार का सबसे बड़ा गुरु है।"


काशीवास का वास्तविक अर्थ क्या है?

बहुत से लोग सोचते हैं कि काशीवास का अर्थ केवल काशी में जाकर रहना है।

लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा है।

काशीवास का वास्तविक अर्थ है—

  • ईश्वर का स्मरण करना
  • जीवन की नश्वरता को समझना
  • अहंकार का त्याग करना
  • सत्य के मार्ग पर चलना

शास्त्र कहते हैं कि असंख्य जन्मों के पुण्य कर्मों के बाद ही किसी जीव को काशीवास का सौभाग्य प्राप्त होता है।


उत्तरवाहिनी गंगा का महत्व

सामान्यतः नदियाँ दक्षिण या पूर्व दिशा की ओर बहती हैं।

लेकिन काशी में गंगा उत्तर दिशा की ओर बहती हैं।

इसी कारण उन्हें उत्तरवाहिनी गंगा कहा जाता है।

सनातन परंपरा में उत्तर दिशा को देवताओं और ज्ञान की दिशा माना गया है।

इसलिए उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान को विशेष पुण्यदायी माना गया है।

यह केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि मन और चेतना की शुद्धि का प्रतीक है।


तारक मंत्र क्या है?

यह विषय काशी के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है।

"तारक" शब्द का अर्थ है—पार लगाने वाला।

अर्थात ऐसा मंत्र जो जीव को जन्म-मरण के चक्र से पार करा दे।

मान्यता है कि जब कोई जीव काशी में अंतिम श्वास लेता है, तब भगवान शिव स्वयं उसके कान में तारक मंत्र का उपदेश देते हैं।

यह कोई सामान्य ध्वनि नहीं, बल्कि परम ज्ञान का दिव्य संदेश है।

यह आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराता है।


मोक्ष का वास्तविक अर्थ

अधिकांश लोग मोक्ष का अर्थ केवल मृत्यु के बाद मिलने वाली स्थिति समझते हैं।

लेकिन शास्त्रों के अनुसार मोक्ष का आरंभ जीवन में ही हो जाता है।

जब मनुष्य—

  • लोभ से मुक्त हो जाए
  • भय से मुक्त हो जाए
  • अहंकार से मुक्त हो जाए
  • ईश्वर में स्थिर हो जाए

तब वह मोक्ष के मार्ग पर चल पड़ता है।

मोक्ष का अर्थ है—आंतरिक स्वतंत्रता।


एक प्रेरणादायक आध्यात्मिक कथा

एक वृद्ध साधक जीवनभर धन और प्रतिष्ठा अर्जित करने में लगा रहा।

उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया, लेकिन मन की शांति नहीं मिली।

बुढ़ापे में उसे महसूस हुआ कि जीवन का अधिकांश समय उसने बाहरी उपलब्धियों के पीछे बिताया, पर स्वयं को जानने का प्रयास नहीं किया।

वह एक पवित्र तीर्थ में रहने लगा।

वहाँ उसने प्रतिदिन ध्यान, जप और आत्मचिंतन शुरू किया।

धीरे-धीरे उसके भीतर अद्भुत परिवर्तन आने लगा।

जो व्यक्ति पहले छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित हो जाता था, अब शांत रहने लगा।

जो मृत्यु से डरता था, अब उसे जीवन का स्वाभाविक सत्य मानने लगा।

जब उसके अंतिम क्षण आए, तब उसके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि संतोष था।

उसकी आँखों में एक अलग प्रकाश दिखाई दे रहा था।

उसने कहा—

"मैंने जीवनभर बाहर खोजा, पर जिसे खोज रहा था वह मेरे भीतर ही था।"

यह कथा हमें सिखाती है कि मोक्ष किसी स्थान विशेष में नहीं, बल्कि चेतना की अवस्था में है।


आज के जीवन में मणिकर्णिका का संदेश

1. तनाव कम करने में सहायक

आज लोग छोटी-छोटी बातों से तनाव में आ जाते हैं।

जब हम जीवन की अस्थिरता को समझते हैं, तब अनेक चिंताएँ स्वतः छोटी लगने लगती हैं।


2. मृत्यु के भय को कम करता है

मृत्यु को समझना जीवन को समझना है।

जो व्यक्ति मृत्यु के सत्य को स्वीकार कर लेता है, वह जीवन को अधिक साहस के साथ जीता है।


3. असफलताओं से उबरने की शक्ति देता है

यदि सब कुछ नश्वर है, तो असफलता भी स्थायी नहीं है।

यह दृष्टिकोण व्यक्ति को पुनः प्रयास करने की शक्ति देता है।


4. मानसिक शांति प्रदान करता है

ईश्वर स्मरण और आत्मचिंतन मन को स्थिर बनाते हैं।

यही कारण है कि आध्यात्मिक जीवन जीने वाले लोग विपरीत परिस्थितियों में भी अपेक्षाकृत शांत रहते हैं।


5. आत्मविश्वास बढ़ाता है

जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर नहीं बल्कि आत्मा मानने लगता है, तब उसके भीतर एक नया आत्मविश्वास जागृत होता है।


सरल शिव साधना

यदि आप काशी नहीं जा सकते तो भी भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

प्रतिदिन सुबह या शाम निम्न साधना करें—

साधना विधि

  • स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • भगवान शिव का ध्यान करें।
  • दीपक जलाएँ।
  • 108 बार मंत्र जप करें।

मंत्र

ॐ नमः शिवाय

यह पंचाक्षरी मंत्र मन को शांति, शक्ति और सकारात्मकता प्रदान करता है।


काशी हमें क्या सिखाती है?

काशी हमें सिखाती है—

  • जीवन अनमोल है।
  • समय सीमित है।
  • अहंकार व्यर्थ है।
  • प्रेम ही वास्तविक धन है।
  • ईश्वर ही अंतिम सत्य है।

मणिकर्णिका हमें मृत्यु नहीं, बल्कि जीवन का महत्व सिखाती है।

यह हमें याद दिलाती है कि जो आज हमारे पास है, वह हमेशा नहीं रहेगा।

इसलिए हर दिन को ईश्वर का प्रसाद मानकर जीना चाहिए।


निष्कर्ष

महाश्मशान मणिकर्णिका केवल एक श्मशान नहीं है, बल्कि मानव जीवन के सबसे बड़े सत्य का विश्वविद्यालय है। यहाँ जलती हुई चिताएँ हमें भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि जागृत करने के लिए हैं।

काशी हमें सिखाती है कि जीवन का उद्देश्य केवल धन, पद और प्रतिष्ठा अर्जित करना नहीं है। वास्तविक उद्देश्य स्वयं को जानना, ईश्वर से जुड़ना और आत्मा की शांति प्राप्त करना है।

जब मनुष्य यह समझ लेता है कि शरीर नश्वर है पर आत्मा शाश्वत है, तब उसके भीतर का भय समाप्त होने लगता है।

यही काशी का संदेश है।

यही मणिकर्णिका का रहस्य है।

और यही भगवान शिव की करुणा है।



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काशी, शिव और मोक्ष

महाश्मशान मणिकर्णिका, तारक मंत्र और आत्मज्ञान पर आधारित आध्यात्मिक दोहावली

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दोहा १
काशी नगरी दीप सी, जले ज्ञान की बात।
जिसने भीतर झाँक लिया, मिटे अज्ञान की रात॥
दोहा २
गली-गली में गूँजता, शिव का अमर संदेश।
तन क्षणभंगुर जान ले, आत्मा रहे विशेष॥
दोहा ३
काशी केवल नगर नहीं, चेतन का विस्तार।
जो खुद को पहचान ले, उतरे भव-पार॥
<
दोहा ४
मणिकर्णिका की राख में, छिपा बड़ा उपदेश।
राजा रंक सभी यहाँ, छोड़ चलें परिवेश॥
दोहा ५
जलती चिता पुकारती, सुन रे मन अभिमान।
जो कुछ तेरा मानता, सब रह जाए श्मशान॥
दोहा ६
श्मशानन गुरु जगत का, बोले मौन जुबान।
क्षणभंगुर यह देह है, अमर आत्म पहचान॥
दोहा ७
मृत्यु नहीं है अंत रे, जीवन का बदलाव।
जैसे संध्या ढल गई, फिर हो नव प्रभाव॥
दोहा ८
डरता क्यों है मृत्यु से, यह तो प्रभु का द्वार।
एक श्वास से दूसरी, यात्रा अपरम्पार॥
दोहा ९
जिसने मरना सीख लिया, जीना उसका धन्य।
भय के बंधन टूटते, मन हो जाता पवित्र॥
दोहा १०
शिव बैठे काशी धरे, करुणा सागर नाथ।
तारक मंत्र सुनाय के, ले जाते हैं साथ॥
दोहा ११
कानन भीतर गूँजता, शिव का दिव्य विचार।
"तू शरीर नहीं रे जीव, तू है ज्योति अपार"॥
दोहा १२
शिव की महिमा अगम है, अगम उनका ज्ञान।
एक कृपा की दृष्टि से, मिट जाए अज्ञान॥
दोहा १३
उत्तरवाही गंग जल, धोए मन का भार।
श्रद्धा से जो डूब गया, उतरा भव-पार॥
दोहा १४
गंगा केवल नीर नहीं, शिव चरणन की धूल।
जिसने इसका मान किया, जीवन हुआ अमूल्य॥
दोहा १५
मोक्ष न कोई दूर है, न कोई है ठौर।
मोह मिटे जब मन से, खुल जाए प्रभु-द्वार॥
दोहा १६
लोभ मोह के जाल में, फँसा रहा दिन-रात।
वैरागी बन एक पल, मिले आत्म की बात॥
दोहा १७
धन वैभव सब छूटते, छूटे कुल अभिमान।
नाम सहेजे जो चले, वही हुआ धनवान॥
दोहा १८
माटी का यह देह है, माटी में मिल जाय।
सत्कर्मों की सुगंध ही, जग में रहनु पाय॥
दोहा १९
काल चुपचाप चल रहा, करता नहीं शोर।
आज मिला जो श्वास है, उसका कर उपयोग॥
दोहा २०
जीवन चार दिवस का, मत कर झूठा मान।
प्रेम, दया, सेवा रखो, यही सच्ची पहचान॥
दोहा २१
भीतर मंदिर खोज ले, बाहर क्या भटके।
अपने ही अंतर बसे, शिव जिनको सब तकें॥
दोहा २२
ॐ नमः शिवाय जपत, निर्मल होय विचार।
मन के सारे संशय मिटें, जागे आत्म प्रकाश॥
दोहा २३
जो अपने को जान ले, जान ले सब सार।
बूंद समाई सिंधु में, मिटा भेद संसार॥
दोहा २४
काशी मन के बीच है, मणिकर्णिका ध्यान।
अहंकार की चिता जले, जागे आत्म ज्ञान॥
दोहा २५
कबिरा जैसी बात यह, सुन ले मन गंभीर।
जो खुद को पहचान गया, मिला उसे शिव धीर॥
दोहा २६
राख बनी देह एक दिन, रह जाए बस नाम।
शिव चरणों में जो झुका, उसका सफल मुकाम॥
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