टूटी हुई श्रद्धा से ईश्वर कृपा तक: एक प्रेरणादायक आध्यात्मिक कथा
श्रद्धा की परीक्षा और दिव्य चमत्कार: एक भावनात्मक आध्यात्मिक अनुभव
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| जब ईश्वर ने खाली जीवन को अनंत प्रेम और आशा से भर दिया |
भूमिका
जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब मनुष्य स्वयं को पूर्णतः अकेला, असहाय और निराश अनुभव करता है। बार-बार की असफलताएँ, अधूरी इच्छाएँ और परिस्थितियों का बोझ कभी-कभी हमारी श्रद्धा को भी डगमगा देता है। ऐसा लगता है मानो ईश्वर ने हमारी पुकार सुनना ही छोड़ दिया हो।
किन्तु सनातन परंपरा हमें सिखाती है कि ईश्वर मौन अवश्य रहते हैं, परंतु अनुपस्थित कभी नहीं होते। जब समय पूर्ण होता है, तब उनकी कृपा ऐसे प्रकट होती है कि जीवन का प्रत्येक अंधकार प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है।
यह कथा उसी दिव्य क्षण की है, जब खंडित विश्वास पुनः अखंड हुआ और एक निराश हृदय को ईश्वर का अनुपम उपहार प्राप्त हुआ।
श्रद्धा की परीक्षा और ईश्वर की कृपा
शास्त्रीय आधार
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
"श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।"
— भगवद्गीता 4.39
अर्थात् जो श्रद्धा रखता है, वही अंततः ईश्वर के सत्य और कृपा को प्राप्त करता है।
सनातन धर्म की अनेक कथाओं में वर्णन मिलता है कि जब भक्त की परीक्षा अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है, तभी ईश्वर की कृपा भी अपने सर्वोच्च रूप में प्रकट होती है।
सरल अर्थ और व्याख्या
कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जब व्यक्ति ईश्वर से प्रश्न करने लगता है—
- मेरे साथ ही ऐसा क्यों?
- मेरी प्रार्थना क्यों नहीं सुनी जा रही?
- क्या मेरी भक्ति व्यर्थ है?
यही वह समय होता है जब श्रद्धा की वास्तविक परीक्षा होती है।
ईश्वर तत्काल उत्तर नहीं देते, क्योंकि वे केवल हमारी इच्छा पूरी नहीं करते, बल्कि हमें भीतर से मजबूत भी बनाते हैं।
कठिन शब्दों का सरल अर्थ
| कठिन शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| श्रद्धा | विश्वास |
| अखंडित | जो टूटा न हो |
| क्षमायाचना | क्षमा माँगना |
| मातृशक्ति | माँ का दिव्य प्रेम |
| कायाकल्प | पूर्ण परिवर्तन |
| चरमानंद | सर्वोच्च आनंद |
मातृत्व: ईश्वर की सबसे कोमल अभिव्यक्ति
सनातन परंपरा में माँ को स्वयं आद्यशक्ति का स्वरूप माना गया है।
जब किसी हृदय में निस्वार्थ प्रेम जागता है, तब वह केवल मनुष्य नहीं रहता, बल्कि ईश्वर की करुणा का माध्यम बन जाता है।
माँ का प्रेम किसी रक्त संबंध का मोहताज नहीं होता।
जहाँ प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
जहाँ करुणा है, वहीं दिव्यता है।
और जहाँ समर्पण है, वहीं सच्चा मातृत्व है।
प्रेरणादायक कथा: जब नियति ने खाली झोली भर दी
एक निर्धन दंपति वर्षों से संतान सुख की प्रतीक्षा कर रहा था।
समय बीतता गया।
प्रार्थनाएँ होती रहीं।
व्रत और उपवास भी हुए।
लेकिन उनकी झोली खाली रही।
धीरे-धीरे मन में पीड़ा बढ़ी और ईश्वर के प्रति विश्वास भी कमजोर पड़ने लगा।
एक दिन जीवन के सबसे अंधकारमय क्षण में उन्हें एक ऐसा उपहार मिला जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
एक असहाय बालक उनके जीवन में आया।
उस छोटे से स्पर्श ने सब कुछ बदल दिया।
जिस हृदय में शिकायत थी वहाँ कृतज्ञता आ गई।
जिस मन में निराशा थी वहाँ आशा का दीप जल उठा।
जिस श्रद्धा के टुकड़े हो चुके थे, वे पुनः जुड़ गए।
उन्हें समझ आया कि ईश्वर कभी किसी को खाली नहीं रखते। वे केवल सही समय की प्रतीक्षा करते हैं।
वर्तमान जीवन में इस शिक्षा का महत्व
आज का मनुष्य अनेक मानसिक चुनौतियों से गुजर रहा है।
1. तनाव में सहायक
जब हम ईश्वर की योजना पर विश्वास करते हैं तो भविष्य की चिंता कम हो जाती है।
2. भय को दूर करता है
विश्वास हमें यह अनुभव कराता है कि हम अकेले नहीं हैं।
3. असफलता से उबरने की शक्ति देता है
हर असफलता किसी बड़ी सफलता की तैयारी हो सकती है।
4. मानसिक शांति प्रदान करता है
समर्पण का भाव मन को स्थिर बनाता है।
5. आत्मविश्वास बढ़ाता है
ईश्वर पर विश्वास धीरे-धीरे स्वयं पर विश्वास में परिवर्तित हो जाता है।
श्रद्धा बढ़ाने के सरल उपाय
प्रतिदिन यह मंत्र जपें
ॐ नमः शिवाय
या
हर हर महादेव
108 बार जप करने से मन शांत और सकारात्मक बनता है।
सुबह के समय
- दीपक जलाएँ
- भगवान को जल अर्पित करें
- 5 मिनट मौन ध्यान करें
रात्रि में
दिनभर के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें।
कृतज्ञता श्रद्धा को मजबूत करती है।
निष्कर्ष
जीवन का प्रत्येक अंधकार स्थायी नहीं होता।
कभी-कभी ईश्वर हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर वैसा नहीं देते जैसा हम चाहते हैं, बल्कि उससे कहीं अधिक सुंदर रूप में देते हैं।
जब परिस्थितियाँ टूटती हुई प्रतीत हों, तब विश्वास बनाए रखें।
संभव है कि वही क्षण आपके जीवन के सबसे बड़े चमत्कार की भूमिका लिख रहा हो।
अपने आप से एक प्रश्न अवश्य पूछिए—
क्या मैं परिस्थितियों पर विश्वास कर रहा हूँ या ईश्वर पर?
उत्तर ही आपके जीवन की दिशा निर्धारित करेगा।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
1. श्रद्धा कमजोर होने पर क्या करना चाहिए?
नियमित प्रार्थना, मंत्रजप और सत्संग से श्रद्धा पुनः मजबूत हो सकती है।
2. क्या ईश्वर हर प्रार्थना सुनते हैं?
हाँ, परंतु उत्तर हमेशा हमारे इच्छित समय और रूप में नहीं मिलता।
3. मातृत्व को दिव्य शक्ति क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उसमें निस्वार्थ प्रेम, करुणा और पूर्ण समर्पण का भाव होता है।
4. मानसिक तनाव में कौन-सा मंत्र लाभकारी है?
"ॐ नमः शिवाय" का जप मन को शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
5. जीवन में बार-बार असफलता मिलने पर क्या करें?
असफलता को अंत नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा दिया गया सीखने का अवसर मानें और प्रयास जारी रखें।
6. क्या टूटी हुई श्रद्धा पुनः लौट सकती है?
हाँ, एक सच्चा आध्यात्मिक अनुभव या ईश्वर की कृपा मनुष्य के विश्वास को पुनः जागृत कर सकती है।
7. ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग क्या है?
निष्काम भक्ति, कृतज्ञता और सच्चे हृदय से किया गया स्मरण।
जब जीवन की सारी उम्मीदें टूटने लगती हैं
जीवन का सबसे कठिन समय वह नहीं होता जब हमारे पास धन की कमी हो, बल्कि वह होता है जब हमारे हृदय में आशा की कमी होने लगती है। मनुष्य बहुत कुछ सह सकता है, लेकिन जब उसकी प्रार्थनाएँ अनसुनी प्रतीत होने लगती हैं, तब उसका विश्वास डगमगाने लगता है। वह सोचने लगता है कि क्या वास्तव में ईश्वर उसकी सुन रहे हैं? क्या उसकी भक्ति का कोई मूल्य है?
कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब हम स्वयं को पूर्णतः अकेला अनुभव करते हैं। वर्षों की प्रतीक्षा, अधूरी इच्छाएँ, समाज के ताने, और परिस्थितियों का बोझ मन को भीतर तक तोड़ देता है। उस समय श्रद्धा भी परीक्षा के दौर से गुजरती है।
लेकिन सनातन धर्म का एक गहरा सत्य है—ईश्वर कभी देर कर सकते हैं, पर अंधेर नहीं करते। जब मनुष्य को लगता है कि सब कुछ समाप्त हो गया है, तभी कहीं न कहीं ईश्वर उसके लिए एक नया अध्याय लिख रहे होते हैं।
यह कथा केवल एक व्यक्ति की नहीं है। यह उन सभी लोगों की कहानी है जिन्होंने कभी जीवन में निराशा का अनुभव किया है, जिन्होंने कभी ईश्वर से प्रश्न किया है, जिन्होंने कभी रोते हुए रातें बिताई हैं और फिर भी भीतर कहीं विश्वास की छोटी-सी लौ को जीवित रखा है।
श्रद्धा क्या है और क्यों आवश्यक है?
श्रद्धा केवल विश्वास नहीं है
अधिकांश लोग श्रद्धा को केवल पूजा-पाठ से जोड़ते हैं। लेकिन वास्तविक श्रद्धा उससे कहीं अधिक गहरी होती है।
श्रद्धा का अर्थ है—
- ईश्वर पर भरोसा रखना।
- कठिन समय में भी सकारात्मक बने रहना।
- परिस्थितियों से हार न मानना।
- यह विश्वास रखना कि जो हो रहा है, उसके पीछे कोई दिव्य योजना है।
जब मनुष्य की श्रद्धा मजबूत होती है, तब वह जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाई को भी सहन कर लेता है।
लेकिन जब श्रद्धा टूटती है, तब मनुष्य भीतर से कमजोर हो जाता है।
शास्त्रों में श्रद्धा का महत्व
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
"श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।"
अर्थात् श्रद्धावान व्यक्ति ही वास्तविक ज्ञान और सत्य को प्राप्त करता है।
शास्त्रों में बार-बार बताया गया है कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग श्रद्धा है।
न धन, न बल, न विद्वता,
बल्कि सच्चे हृदय का विश्वास ही मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है।
जब श्रद्धा टूटने लगती है
हर व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय आता है जब वह ईश्वर से शिकायत करने लगता है।
वह सोचता है—
- मैं पूजा करता हूँ, फिर भी दुख क्यों?
- मैं किसी का बुरा नहीं करता, फिर भी कठिनाइयाँ क्यों?
- मेरी प्रार्थनाएँ पूरी क्यों नहीं हो रहीं?
यहीं से श्रद्धा की परीक्षा प्रारंभ होती है।
सच्चाई यह है कि कठिन समय ईश्वर की अनुपस्थिति का संकेत नहीं होता। वह अक्सर ईश्वर की सबसे बड़ी तैयारी का समय होता है।
जिस प्रकार बीज मिट्टी के भीतर दबकर अंधकार सहता है, उसी प्रकार मनुष्य भी संघर्षों से गुजरकर ही जीवन में खिलता है।
ईश्वर की कृपा हमेशा हमारी अपेक्षा से बड़ी होती है
मनुष्य सीमित दृष्टि से सोचता है।
वह आज को देखता है।
ईश्वर सम्पूर्ण भविष्य को देखते हैं।
हम जो माँगते हैं, वह अक्सर हमारी सीमित समझ का परिणाम होता है। लेकिन ईश्वर जो देते हैं, वह हमारी आवश्यकता के अनुसार होता है।
कई बार हम किसी एक इच्छा के लिए रोते हैं, जबकि ईश्वर हमारे लिए उससे कहीं अधिक सुंदर उपहार तैयार कर रहे होते हैं।
इसलिए संतों ने कहा है—
"ईश्वर को आदेश मत दो, उन्हें अपना मार्गदर्शक बनने दो।"
मातृत्व: ईश्वर की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति
सनातन संस्कृति में माँ को देवी का स्वरूप माना गया है।
माँ केवल जन्म देने वाली नहीं होती।
माँ वह है—
- जो प्रेम देती है।
- जो सुरक्षा देती है।
- जो त्याग करती है।
- जो बिना किसी स्वार्थ के अपनाती है।
मातृत्व रक्त संबंधों से बड़ा होता है।
जहाँ निस्वार्थ प्रेम है, वहीं मातृत्व है।
जहाँ करुणा है, वहीं ईश्वर का वास है।
प्रेम कैसे जीवन बदल देता है?
प्रेम में अद्भुत शक्ति होती है।
यह टूटे हुए मन को जोड़ सकता है।
यह निराश व्यक्ति में आशा जगा सकता है।
यह भय को साहस में बदल सकता है।
जब किसी व्यक्ति के जीवन में सच्चा प्रेम आता है, तो उसका सम्पूर्ण दृष्टिकोण बदल जाता है।
जो व्यक्ति कल तक जीवन से निराश था, वही आज भविष्य के सपने देखने लगता है।
प्रेरणादायक आध्यात्मिक कथा
बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव में एक दंपति रहता था।
उनका जीवन अत्यंत साधारण था।
उनके पास न अधिक धन था और न ही कोई विशेष सुविधा।
लेकिन उनके हृदय में एक गहरी इच्छा थी।
वे चाहते थे कि उनका घर प्रेम और किलकारियों से भर जाए।
वर्ष बीतते गए।
प्रतीक्षा बढ़ती गई।
प्रार्थनाएँ होती रहीं।
मंदिरों के दर्शन हुए।
व्रत रखे गए।
लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई।
धीरे-धीरे उनके मन में निराशा आने लगी।
एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि शायद ईश्वर ने उनकी सुनना ही छोड़ दिया है।
लेकिन नियति कुछ और लिख चुकी थी।
एक दिन उनके जीवन में एक ऐसा बालक आया जिसने सब कुछ बदल दिया।
उसकी मासूम मुस्कान ने उनके घर को आनंद से भर दिया।
उसके छोटे-छोटे हाथों ने उनके जीवन की सारी पीड़ा मिटा दी।
उसके आगमन के साथ उन्हें समझ आया कि ईश्वर कभी किसी को खाली नहीं रखते।
वे केवल सही समय की प्रतीक्षा करते हैं।
उस दिन उनकी टूटी हुई श्रद्धा पुनः जीवित हो गई।
जीवन में चमत्कार कैसे होते हैं?
बहुत से लोग चमत्कार को केवल अलौकिक घटनाओं से जोड़ते हैं।
लेकिन वास्तविक चमत्कार क्या है?
- निराश व्यक्ति का फिर से मुस्कुराना।
- टूटे हुए मन का फिर से आशा करना।
- भयभीत व्यक्ति का साहसी बन जाना।
- अकेले व्यक्ति का प्रेम प्राप्त करना।
ये सभी ईश्वर के चमत्कार हैं।
वर्तमान समय में इस शिक्षा का महत्व
आज का युग सुविधाओं का है, लेकिन शांति का नहीं।
हर व्यक्ति किसी न किसी चिंता से घिरा हुआ है।
तनाव
लोग भविष्य की चिंता में वर्तमान खो रहे हैं।
भय
असफलता का भय लोगों को आगे बढ़ने नहीं देता।
अकेलापन
सोशल मीडिया के युग में भी लोग भीतर से अकेले हैं।
अवसाद
कई लोग जीवन का उद्देश्य ही खो चुके हैं।
ऐसे समय में श्रद्धा एक मानसिक शक्ति बनकर उभरती है।
श्रद्धा तनाव को कैसे कम करती है?
जब हम मान लेते हैं कि ईश्वर हमारे साथ हैं, तब मन का बोझ हल्का होने लगता है।
हम हर समस्या को अकेले नहीं उठाते।
हम उसे ईश्वर को समर्पित कर देते हैं।
यही समर्पण तनाव को कम करता है।
भय को कैसे समाप्त करती है?
भय का मूल कारण असुरक्षा है।
जब व्यक्ति को लगता है कि वह अकेला है, तब भय बढ़ता है।
लेकिन जब उसे अनुभव होता है कि ईश्वर उसके साथ हैं, तब साहस जागृत होता है।
इसीलिए भक्त सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं।
असफलता को सफलता में बदलने की शक्ति
असफलता जीवन का अंत नहीं है।
यह केवल एक नया पाठ है।
ईश्वर हमें गिराकर तोड़ते नहीं।
वे हमें गिराकर मजबूत बनाते हैं।
हर संघर्ष भविष्य की तैयारी है।
मानसिक शांति का रहस्य
आज हर व्यक्ति शांति चाहता है।
लेकिन शांति बाहर नहीं मिलती।
वह भीतर से आती है।
जब मनुष्य स्वीकार करना सीख जाता है कि हर घटना के पीछे ईश्वर की योजना है, तब उसका मन शांत होने लगता है।
आत्मविश्वास और ईश्वर
सच्चा आत्मविश्वास अहंकार से नहीं आता।
वह विश्वास से आता है।
जब व्यक्ति यह जान लेता है कि ईश्वर उसकी सहायता कर रहे हैं, तब उसके भीतर अद्भुत शक्ति उत्पन्न होती है।
श्रद्धा बढ़ाने के सरल उपाय
1. प्रतिदिन प्रार्थना करें
प्रार्थना मन को ईश्वर से जोड़ती है।
2. मंत्र जप करें
"ॐ नमः शिवाय"
या
"हर हर महादेव"
का नियमित जप अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
3. कृतज्ञता का अभ्यास करें
प्रतिदिन पाँच ऐसी बातों के लिए धन्यवाद दें जो आपके जीवन में अच्छी हैं।
4. सत्संग सुनें
सकारात्मक विचार मन को मजबूत बनाते हैं।
5. सेवा करें
निस्वार्थ सेवा श्रद्धा को गहरा करती है।
ईश्वर कब सुनते हैं?
यह प्रश्न लगभग हर भक्त के मन में आता है।
उत्तर सरल है—
ईश्वर हर समय सुनते हैं।
लेकिन वे उत्तर उसी समय देते हैं जब वह हमारे लिए सर्वोत्तम होता है।
यदि आज कोई इच्छा पूरी नहीं हुई, तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपकी प्रार्थना व्यर्थ गई।
हो सकता है ईश्वर आपके लिए कुछ बेहतर तैयार कर रहे हों।
जीवन का सबसे बड़ा सत्य
जीवन में सब कुछ बदलता है।
सुख बदलता है।
दुख बदलता है।
समय बदलता है।
परिस्थितियाँ बदलती हैं।
लेकिन ईश्वर का प्रेम नहीं बदलता।
वह हर परिस्थिति में हमारे साथ रहता है।
निष्कर्ष: जब विश्वास जीवित रहता है
जीवन के सबसे अंधकारमय क्षणों में भी आशा का दीपक बुझने मत दीजिए।
यदि आज परिस्थितियाँ कठिन हैं, तो याद रखिए—
रात जितनी गहरी होती है, सूर्योदय उतना ही निकट होता है।
यदि आपकी प्रार्थनाएँ अभी पूरी नहीं हुईं, तो निराश मत होइए।
संभव है कि ईश्वर आपके लिए वह लिख रहे हों जिसकी आपने कभी कल्पना भी न की हो।
विश्वास बनाए रखिए।
श्रद्धा बनाए रखिए।
प्रेम बनाए रखिए।
क्योंकि जब ईश्वर कृपा करते हैं, तब टूटी हुई श्रद्धा भी जीवन का सबसे सुंदर उत्सव बन जाती है।
श्रद्धा, कृपा और भक्ति के दोहे
टूटी हुई श्रद्धा से दिव्य कृपा तक की आध्यात्मिक यात्रा, विश्वास, समर्पण, मातृत्व और ईश्वर की अनंत कृपा को समर्पित।
श्रद्धा टूटी मन डरा, छाया घोर अँधार।
पग-पग पर जब हार मिली, तब मिला करतार॥
मन मंदिर सूना पड़ा, बुझी भरोसे बाति।
एक कृपा की ज्योत से, जगमग हुई प्रभाति॥
दुख की धूप प्रचंड जब, तन-मन दे झुलसाय।
तब श्रद्धा की छाँव ही, जीवन राह दिखाय॥
टूटी डोरी प्रेम की, बिखरे मन के तार।
कृपा-सूत्र से बाँधकर, जोड़े पालनहार॥
देरी करता देव है, अंधेर कभी न होय।
समय पके जब भाग्य का, कृपा बरसती सोय॥
माँगे जग कुछ और ही, देव देय कुछ और।
जिसमें हित संसार का, वही खुलावे ठौर॥
रोया मन दर-दर फिरा, खोजे अपना भाग।
देव द्वारे बैठकर, पाया सुख अनुराग॥
खाली झोली देखकर, मत तू होना खिन्न।
देने वाला जानता, कब भरना है भिन्न॥
ममता ऐसी छाँव है, जहाँ न पहुँचे ताप।
ईश्वर बैठा प्रेम बन, माँ के निर्मल आप॥
रक्त नहीं पहचानता, सच्चे प्रेम का रंग।
ममता जिसको छू गई, जीवन हुआ उमंग॥
कोमल कर का स्पर्श जब, हृदय भूमि पर जाय।
सूखी डाली भी तभी, नव कोंपल बन जाय॥
ममता की गंगाजलि, धोवे मन के दाग।
जिस घर इसका वास हो, वहाँ बसे अनुराग॥
बीज पड़ा है भूमि में, सहता वर्षा-धूप।
धीरज रख फल एक दिन, बनता सुंदर रूप॥
अधीर न होना साधु रे, चलता अपना काल।
फूल तभी खिलता भला, जब हो ऋतु अनुकूल॥
जो मिलता तत्काल है, टिकता नहीं अधिकाय।
जो मिलता प्रभु समय पर, जीवन भर सुखदाय॥
रात अँधेरी देख मत, छोड़ भरोसे डोर।
सूरज लेकर आ रहा, प्रभु स्वर्णिम भोर॥
दुख भी गुरु का रूप है, देता नूतन ज्ञान।
तपकर सोना बन सके, ऐसा इसका दान॥
सुख में सबको देव याद, दुख में टूटे नेह।
जो विपदा में भी टिका, वही सच्चा सनेह॥
आँसू भी वरदान हैं, धोते मन के मैल।
रोकर जो हल्का हुआ, पा ले जीवन खेल॥
घोर निशा के बाद ही, उगता है दिनमान।
धैर्य धरे जो जीव है, उसका हो कल्याण॥
छोड़ नियंत्रण हाथ का, दे प्रभु को अधिकार।
नैया उसकी चाल पर, पहुँचे पारापार॥
अपना-अपना छोड़कर, जिसने किया समर्पण।
उसके जीवन में हुआ, हर क्षण नव सृजन॥
मन कहता मैं करूँ, अहं करे हुंकार।
प्रभु कहते चुप हो जरा, मैं हूँ पालनहार॥
जहाँ समर्पण भाव है, वहाँ नहीं संताप।
ईश्वर अपने आप ही, भर देता है आप॥
चिंता चिता समान है, जलता भीतर प्राण।
श्रद्धा शीतल जल बने, दे जीवन को त्राण॥
विश्वासों की छाँव में, खिलता मन का फूल।
संदेहों के ताप से, जीवन जाए भूल॥
अपने ऊपर जो करे, ईश्वर जैसा मान।
उसके भीतर जागता, अद्भुत आत्मज्ञान॥
भय भागे विश्वास से, जैसे तम से भोर।
एक नाम का दीप ही, कर दे जग उज्जोर॥
टूटी श्रद्धा जोड़कर, जिसने रखा विश्वास।
उसके जीवन में हुआ, कृपा-सिंधु निवास॥
कहे संत सुन साधु रे, मत होना निराश।
प्रभु लिखता हर जीव का, सुंदर नव इतिहास॥
खाली गोदी, रिक्त मन, सब भर देता राम।
जब-जब सच्चा प्रेम हो, मिलता उसका धाम॥
श्रद्धा रख, धीरज धरे, कर ले मन निष्काम।
जो कुछ होता जगत में, सबमें बसते राम॥

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