श्री विष्णु सहस्रनाम अर्थ सहित | 1000 नामों की व्याख्या और पाठ
- डॉ संजय कुमार कमार
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| "श्री विष्णु सहस्रनाम — भगवान विष्णु के दिव्य 1000 नामों का आध्यात्मिक अध्ययन।" |
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विष्णु सहस्रनाम फलश्रुति
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ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ९
४१. महास्वनः
शब्दार्थ :
महान् नाद वाले; जिनकी दिव्य ध्वनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में गूँजती है।
महान् नाद वाले; जिनकी दिव्य ध्वनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में गूँजती है।
भगवान का दिव्य स्वरूप वेदों के प्रणव (ॐ) और समस्त वैदिक ध्वनियों का मूल है। उनका वचन समस्त सृष्टि को धर्म और सत्य की ओर प्रेरित करता है।
४२. अनादिनिधनः
शब्दार्थ :
जिसका न आदि है और न अन्त।
जिसका न आदि है और न अन्त।
भगवान विष्णु अनादि, अनन्त और शाश्वत हैं। वे जन्म और मृत्यु के बन्धन से परे हैं तथा काल भी उन्हें सीमित नहीं कर सकता।
४३. धाता
शब्दार्थ :
धारण करने वाले; सृष्टि के आधार।
धारण करने वाले; सृष्टि के आधार।
भगवान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण करते हैं। सभी लोक, देवता और जीव उनकी शक्ति से ही स्थित और संचालित रहते हैं।
४४. विधाता
शब्दार्थ :
व्यवस्था करने वाले; नियन्ता।
व्यवस्था करने वाले; नियन्ता।
भगवान समस्त सृष्टि की व्यवस्था, नियम और कर्मफल के विधान के परम नियन्ता हैं। उनका शासन न्यायपूर्ण और धर्ममय है।
४५. धातुरुत्तमः
शब्दार्थ :
समस्त धारण करने वालों में श्रेष्ठ; ब्रह्मा आदि के भी परम आधार।
समस्त धारण करने वालों में श्रेष्ठ; ब्रह्मा आदि के भी परम आधार।
जो ब्रह्मा सहित सभी देवताओं और समस्त सृष्टि के भी आधार हैं, वे भगवान विष्णु 'धातुरुत्तम' कहलाते हैं। वे सभी कारणों के परम कारण हैं।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग १०
४६. अप्रमेयः
शब्दार्थ :
जिसे किसी प्रमाण या सीमा से पूरी तरह मापा न जा सके।
जिसे किसी प्रमाण या सीमा से पूरी तरह मापा न जा सके।
भगवान की महिमा अनन्त है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि उनकी सम्पूर्णता को नहीं जान सकते। वे समस्त ज्ञान और प्रमाणों के मूल आधार हैं।
४७. हृषीकेशः
शब्दार्थ :
इन्द्रियों के स्वामी।
इन्द्रियों के स्वामी।
'हृषीक' का अर्थ इन्द्रियाँ और 'ईश' का अर्थ स्वामी है। भगवान सभी जीवों की इन्द्रियों को शक्ति प्रदान करते हैं और उन्हें सही दिशा देने वाले अन्तर्यामी हैं।
४८. पद्मनाभः
शब्दार्थ :
जिनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ।
जिनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ।
पुराणों में वर्णन है कि भगवान विष्णु की नाभि से कमल प्रकट हुआ, जिस पर ब्रह्माजी विराजमान होकर सृष्टि की रचना करते हैं। यह नाम भगवान की सृजन शक्ति को दर्शाता है।
४९. अमरप्रभुः
शब्दार्थ :
अमर देवताओं के भी स्वामी।
अमर देवताओं के भी स्वामी।
देवता भी भगवान विष्णु की शक्ति पर आश्रित हैं। वे अमर प्राणियों के भी परम नियन्ता और आश्रय हैं।
५०. विश्वकर्मा
शब्दार्थ :
सम्पूर्ण विश्व के रचनाकार।
सम्पूर्ण विश्व के रचनाकार।
भगवान अपनी दिव्य शक्ति से सम्पूर्ण जगत की रचना और व्यवस्था करते हैं। वे सृष्टि के परम शिल्पी और मूल कारण हैं।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ११
५१. मनुः
शब्दार्थ :
मनन करने वाला; धर्म का उपदेश देने वाला।
मनन करने वाला; धर्म का उपदेश देने वाला।
भगवान समस्त ज्ञान और धर्म के मूल स्रोत हैं। मनु के रूप में वे मानव समाज को धर्म, आचार और जीवन व्यवस्था का मार्ग प्रदान करते हैं।
५२. त्वष्टा
शब्दार्थ :
रूप प्रदान करने वाला; सृष्टि का निर्माण करने वाला।
रूप प्रदान करने वाला; सृष्टि का निर्माण करने वाला।
भगवान अपनी शक्ति से विविध प्रकार के रूपों और जीवों की रचना करते हैं। वे सम्पूर्ण विश्व के दिव्य निर्माता हैं।
५३. स्थविष्ठः
शब्दार्थ :
अत्यन्त विशाल और महान स्वरूप वाले।
अत्यन्त विशाल और महान स्वरूप वाले।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान के विराट स्वरूप में स्थित है। उनका स्वरूप सभी सीमाओं से परे और अनन्त विस्तार वाला है।
५४. स्थविरः
शब्दार्थ :
अत्यन्त प्राचीन; सनातन।
अत्यन्त प्राचीन; सनातन।
भगवान का अस्तित्व सृष्टि से भी पहले है। वे अनादि और शाश्वत हैं, इसलिए उन्हें स्थविर कहा गया है।
५५. ध्रुवः
शब्दार्थ :
अचल, स्थिर, नित्य।
अचल, स्थिर, नित्य।
भगवान परम स्थिर सत्य हैं। सम्पूर्ण संसार परिवर्तनशील है, लेकिन परमात्मा का स्वरूप सदा एक समान रहता है।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग १२
५६. अग्राह्यः
शब्दार्थ :
जो इन्द्रियों द्वारा पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं किए जा सकते।
जो इन्द्रियों द्वारा पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं किए जा सकते।
भगवान सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और अनन्त हैं। उन्हें केवल भौतिक इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता, बल्कि भक्ति, ज्ञान और ध्यान के द्वारा अनुभव किया जाता है।
५७. शाश्वतः
शब्दार्थ :
सदैव रहने वाला; सनातन।
सदैव रहने वाला; सनातन।
भगवान काल से परे हैं। सृष्टि का परिवर्तन होता रहता है, परन्तु उनका दिव्य स्वरूप सदैव स्थिर और नित्य रहता है।
५८. कृष्णः
शब्दार्थ :
आनन्दस्वरूप; सबको आकर्षित करने वाला।
आनन्दस्वरूप; सबको आकर्षित करने वाला।
'कृष्ण' नाम का अर्थ है जो सभी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के रूप में उन्होंने धर्म की स्थापना और भक्तों का कल्याण किया।
५९. लोहिताक्षः
शब्दार्थ :
लाल कमल के समान नेत्रों वाले।
लाल कमल के समान नेत्रों वाले।
भगवान के नेत्र करुणा, प्रेम और दिव्य तेज के प्रतीक हैं। वे अपने भक्तों पर सदैव कृपादृष्टि रखते हैं।
६०. प्रतर्दनः
शब्दार्थ :
दुष्टों का नाश करने वाला।
दुष्टों का नाश करने वाला।
भगवान धर्म की रक्षा के लिए अधर्म और अन्याय का विनाश करते हैं। यह नाम उनकी रक्षक और न्यायकारी शक्ति को दर्शाता है।

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