श्री विष्णु सहस्रनाम भाग 13-16 (नाम 65–80) अर्थ सहित | विक्रमी, धन्वी, मेधावी, विक्रमः, क्रमः
डॉ संजय कुमार पवार
![]() |
| भगवान श्रीविष्णु का दिव्य स्वरूप — श्री विष्णु सहस्रनाम भाग 13-16 (नाम 65–80) का आध्यात्मिक अध्ययन। |
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग १३
६१. प्रभूतः
शब्दार्थ :
अत्यन्त सम्पन्न; अनन्त ऐश्वर्य से युक्त।
भगवान विष्णु समस्त दिव्य ऐश्वर्यों, शक्तियों और गुणों से पूर्ण हैं। सम्पूर्ण जगत की समृद्धि और वैभव का मूल स्रोत वही हैं।
६२. त्रिककुब्धाम
शब्दार्थ :
तीनों लोकों के आश्रय; सम्पूर्ण दिशाओं के आधार।
स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान में ही स्थित है। वे सभी दिशाओं और लोकों के परम आधार हैं।
६३. पवित्रम्
शब्दार्थ :
परम पवित्र; जो सबको पवित्र करने वाले हैं।
भगवान का स्मरण, नाम-जप और भक्ति मन, वचन तथा कर्म को शुद्ध करती है। उनका नाम ही परम पवित्रता का स्रोत माना गया है।
६४. मङ्गलं परम्
शब्दार्थ :
सर्वोच्च मंगलस्वरूप।
भगवान विष्णु का स्मरण जीवन में शुभता, शान्ति और कल्याण का कारण बनता है। वे समस्त मंगलों के परम आधार हैं।
६५. ईशानः
शब्दार्थ :
परम स्वामी; समस्त जगत के अधिपति।
भगवान सम्पूर्ण चराचर जगत के नियन्ता हैं। सभी देवता, जीव और प्रकृति उनकी दिव्य इच्छा के अधीन कार्य करते हैं।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग १४
६६. प्राणदः
शब्दार्थ :
प्राण प्रदान करने वाले; जीवनदाता।
भगवान विष्णु समस्त प्राणियों के जीवन के मूल स्रोत हैं। उन्हीं की दिव्य शक्ति से प्रत्येक जीव में प्राणों का संचार होता है तथा सम्पूर्ण सृष्टि संचालित रहती है।
६७. प्राणः
शब्दार्थ :
स्वयं प्राणस्वरूप; समस्त जीवन का आधार।
भगवान केवल प्राण देने वाले ही नहीं, बल्कि स्वयं समस्त जीवों में प्राणरूप से विद्यमान हैं। उनके बिना किसी भी प्राणी का अस्तित्व सम्भव नहीं है।
६८. ज्येष्ठः
शब्दार्थ :
सबसे प्राचीन; सभी से श्रेष्ठ और अग्रज।
भगवान विष्णु सृष्टि के प्रारम्भ से भी पूर्व विद्यमान हैं। वे समस्त देवताओं, ऋषियों और प्राणियों से श्रेष्ठ तथा अनादि परमात्मा हैं।
६९. श्रेष्ठः
शब्दार्थ :
सर्वोत्तम; सभी में श्रेष्ठ।
ज्ञान, धर्म, करुणा, शक्ति और ऐश्वर्य में भगवान विष्णु से श्रेष्ठ कोई नहीं है। वे समस्त गुणों की परम परिपूर्णता और भक्तों के सर्वोच्च आश्रय हैं।
७०. प्रजापतिः
शब्दार्थ :
समस्त प्रजा के स्वामी; सम्पूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता।
भगवान विष्णु सम्पूर्ण चराचर जगत के परम रक्षक और पालनकर्ता हैं। सभी जीव उनकी कृपा से जीवन, संरक्षण और उन्नति प्राप्त करते हैं।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग १५
७१. हिरण्यगर्भः
शब्दार्थ :
स्वर्णमय ब्रह्माण्ड के मूल कारण; सृष्टि का दिव्य बीज।
सम्पूर्ण सृष्टि का प्रारम्भ भगवान की दिव्य शक्ति से हुआ है। वे समस्त ब्रह्माण्ड के आदिकारण तथा समस्त सृजन के मूल बीज हैं। इसलिए उन्हें 'हिरण्यगर्भ' कहा जाता है।
७२. भूगर्भः
शब्दार्थ :
पृथ्वी को धारण करने वाले; पृथ्वी के आधार।
भगवान विष्णु अपनी अनन्त शक्ति से सम्पूर्ण पृथ्वी और समस्त लोकों को धारण करते हैं। सम्पूर्ण जगत उनके ही दिव्य आश्रय में स्थित है।
७३. माधवः
शब्दार्थ :
लक्ष्मीपति; मधुर स्वरूप वाले भगवान।
'मा' का अर्थ महालक्ष्मी और 'धव' का अर्थ पति है। भगवान विष्णु महालक्ष्मी के स्वामी हैं तथा भक्तों को सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण प्रदान करते हैं।
७४. मधुसूदनः
शब्दार्थ :
मधु नामक असुर का संहार करने वाले।
भगवान ने मधु दैत्य का वध कर धर्म की रक्षा की। यह नाम अधर्म, अज्ञान और दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाशकर्ता भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति का प्रतीक है।
७५. ईश्वरः
शब्दार्थ :
परम स्वामी; सर्वशक्तिमान प्रभु।
भगवान विष्णु सम्पूर्ण सृष्टि के सर्वोच्च नियन्ता हैं। समस्त देवता, जीव और प्रकृति उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं। वे अनन्त शक्ति, ज्ञान और करुणा से युक्त परमेश्वर हैं।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग १६
७६. विक्रमी
शब्दार्थ :
महान पराक्रमी; अद्भुत पराक्रम वाले।
भगवान विष्णु अपने दिव्य पराक्रम से अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करते हैं। उनके प्रत्येक अवतार में अद्वितीय वीरता, साहस और धर्मरक्षा का संदेश मिलता है।
७७. धन्वी
शब्दार्थ :
दिव्य धनुष धारण करने वाले।
भगवान अपने शार्ङ्ग धनुष के धारक हैं। वे धर्म की रक्षा तथा भक्तों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और दुष्ट शक्तियों का विनाश करते हैं।
७८. मेधावी
शब्दार्थ :
अनन्त बुद्धि और दिव्य ज्ञान से सम्पन्न।
भगवान समस्त ज्ञान, विवेक और प्रज्ञा के परम स्रोत हैं। उनकी कृपा से मनुष्य को सत्य का बोध, सद्बुद्धि और धर्ममय जीवन का मार्ग प्राप्त होता है।
७९. विक्रमः
शब्दार्थ :
महान पराक्रम करने वाले; अद्भुत वीरता के स्वामी।
भगवान विष्णु का प्रत्येक दिव्य कार्य उनके अनुपम पराक्रम का प्रमाण है। वे असुरों का संहार कर संसार में धर्म, न्याय और शान्ति की स्थापना करते हैं।
८०. क्रमः
शब्दार्थ :
क्रम स्थापित करने वाले; जगत की व्यवस्था के नियन्ता।
सम्पूर्ण सृष्टि भगवान द्वारा निर्धारित नियमों और दिव्य व्यवस्था के अनुसार संचालित होती है। वे ही धर्म, समय और प्रकृति के शाश्वत क्रम के परम आधार हैं।
Internal Links
| Anchor Text | URL |
|---|---|
| श्री विष्णु सहस्रनाम परिचय | /vishnu-sahasranama-parichay |
| विष्णु सहस्रनाम के सभी भाग | /vishnu-sahasranama-all-parts |
| श्री विष्णु सहस्रनाम भाग 15 | /vishnu-sahasranama-part-15 |
| श्री विष्णु सहस्रनाम भाग 17 | /vishnu-sahasranama-part-17 |
| विष्णु सहस्रनाम फलश्रुति | /vishnu-sahasranama-phalashruti |
| विष्णु मंत्र संग्रह | /vishnu-mantra-collection |
| नारायण मंत्र और जप विधि | /narayan-mantra-jap |
| भगवान विष्णु के प्रमुख अवतार | /lord-vishnu-avatars |
| भगवद्गीता आध्यात्मिक ज्ञान | /bhagavad-gita-adhyatmik-gyan |
| सनातन धर्म के प्रमुख स्तोत्र | /sanatan-dharma-stotra |

Comments
Post a Comment