श्री विष्णु सहस्रनाम | नाम ०१–२० शब्दार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या
-डॉ संजय कुमार पवार
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| श्री विष्णु सहस्रनाम – भाग १-४: नाम १-२० का आध्यात्मिक अर्थ एवं व्याख्या। |
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ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग १
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
१. विश्वम्
शब्दार्थ :
सम्पूर्ण जगत, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड।
सम्पूर्ण जगत, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड।
भगवान विष्णु सम्पूर्ण विश्व के रूप में विद्यमान हैं। जो कुछ दृश्य और अदृश्य है, वह सब उन्हीं की अभिव्यक्ति है। वे सृष्टि के कारण, पालनकर्ता और अन्ततः सबको अपने स्वरूप में समाहित करने वाले परम ब्रह्म हैं।
२. विष्णुः
शब्दार्थ :
जो सर्वत्र व्याप्त है।
जो सर्वत्र व्याप्त है।
"विष्" धातु का अर्थ है प्रवेश करना या व्याप्त होना। भगवान विष्णु प्रत्येक जीव, प्रत्येक कण और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। वे अन्तर्यामी और सर्वव्यापक हैं।
३. वषट्कारः
शब्दार्थ :
यज्ञ में उच्चरित होने वाला "वषट्" स्वरूप।
यज्ञ में उच्चरित होने वाला "वषट्" स्वरूप।
समस्त वैदिक यज्ञ भगवान को समर्पित हैं। यज्ञ, मन्त्र, आहुति और यज्ञफल—सबका आधार भगवान विष्णु ही हैं।
४. भूतभव्यभवत्प्रभुः
शब्दार्थ :
भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालों के स्वामी।
भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालों के स्वामी।
भगवान समय से परे हैं। तीनों काल उनके लिए समान हैं और सम्पूर्ण सृष्टि उनके ज्ञान में स्थित है।
५. भूतकृत्
शब्दार्थ :
समस्त प्राणियों की रचना करने वाला।
समस्त प्राणियों की रचना करने वाला।
भगवान विष्णु अपनी दिव्य शक्ति से सम्पूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करते हैं। सभी प्राणी उन्हीं से उत्पन्न होते हैं और उन्हीं पर आश्रित रहते हैं।
॥ ॐ नमो नारायणाय ॥
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग २
६. भूतभृत्
शब्दार्थ:
समस्त प्राणियों का पालन करने वाला।
समस्त प्राणियों का पालन करने वाला।
भगवान समस्त जीवों के पालनकर्ता हैं। भोजन, जल, वायु, सूर्य तथा प्रकृति के सभी साधनों के माध्यम से वे प्रत्येक प्राणी का जीवन धारण कराते हैं।
७. भावः
शब्दार्थ:
शुद्ध अस्तित्व, परम सत्य।
शुद्ध अस्तित्व, परम सत्य।
भगवान का अस्तित्व किसी अन्य पर निर्भर नहीं है। वे स्वयंभू, नित्य, शाश्वत और अपरिवर्तनशील हैं। समस्त सत्य का मूल आधार वही हैं।
८. भूतात्मा
शब्दार्थ:
समस्त प्राणियों के अन्तर्यामी आत्मा।
समस्त प्राणियों के अन्तर्यामी आत्मा।
भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हैं। वे प्रत्येक विचार, भावना और कर्म के साक्षी हैं तथा जीव को भीतर से मार्गदर्शन देते हैं।
९. भूतभावनः
शब्दार्थ:
समस्त प्राणियों का पोषण और उन्नति करने वाला।
समस्त प्राणियों का पोषण और उन्नति करने वाला।
भगवान केवल सृष्टि की रचना ही नहीं करते, बल्कि उसका पालन, संरक्षण और आध्यात्मिक उत्थान भी करते हैं। उनकी कृपा से जीव का कल्याण होता है।
१०. पूतात्मा
शब्दार्थ:
पूर्णतः पवित्र आत्मा।
पूर्णतः पवित्र आत्मा।
भगवान सभी दोषों, पापों और अज्ञान से सर्वथा रहित हैं। उनका स्मरण मन, बुद्धि और हृदय को पवित्र करने वाला माना गया है।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ३
११. परमात्मा
शब्दार्थ:
सभी आत्माओं से श्रेष्ठ परम आत्मा।
सभी आत्माओं से श्रेष्ठ परम आत्मा।
भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित परमात्मा हैं। वे समस्त जीवों के नियन्ता, साक्षी और परम आश्रय हैं।
१२. मुक्तानां परमागतिः
शब्दार्थ:
मुक्त आत्माओं की परम गति।
मुक्त आत्माओं की परम गति।
जो जीव जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं, उनकी अन्तिम प्राप्ति भगवान विष्णु ही हैं। वैकुण्ठ उनका परम धाम माना गया है।
१३. अव्ययः
शब्दार्थ:
जिसका कभी क्षय न हो।
जिसका कभी क्षय न हो।
भगवान नित्य, अविनाशी और अपरिवर्तनशील हैं। समय, स्थान और परिस्थितियाँ उनके स्वरूप को प्रभावित नहीं करतीं।
१४. पुरुषः
शब्दार्थ:
जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है; परम पुरुष।
जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है; परम पुरुष।
वेदों में भगवान को 'पुरुष' कहा गया है क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत में व्याप्त होकर भी उससे परे हैं। पुरुषसूक्त में इसी परम पुरुष का वर्णन मिलता है।
१५. साक्षी
शब्दार्थ:
सबका साक्षी।
सबका साक्षी।
भगवान प्रत्येक जीव के विचार, कर्म और भाव को बिना पक्षपात के जानते हैं। वे निष्पक्ष साक्षी हैं और कर्मफल का विधान उनके शाश्वत नियमों के अनुसार चलता है।
ॐ
श्री विष्णु सहस्रनाम
भाग ४
१६. क्षेत्रज्ञः
शब्दार्थ :
शरीर (क्षेत्र) का ज्ञाता।
शरीर (क्षेत्र) का ज्ञाता।
भगवान प्रत्येक जीव के शरीर, मन और बुद्धि के अन्तर्यामी ज्ञाता हैं। भगवद्गीता में भगवान कहते हैं कि सभी क्षेत्रों (शरीरों) में क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ।
१७. अक्षरः
शब्दार्थ :
जो कभी नष्ट नहीं होता; अविनाशी।
जो कभी नष्ट नहीं होता; अविनाशी।
भगवान नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं। सृष्टि का निर्माण और प्रलय होता रहता है, परन्तु भगवान सदा एक समान रहते हैं।
१८. योगः
शब्दार्थ :
योगस्वरूप; जीव और परमात्मा का मिलन कराने वाला।
योगस्वरूप; जीव और परमात्मा का मिलन कराने वाला।
भगवान स्वयं योगस्वरूप हैं। उनका स्मरण, भक्ति और ध्यान जीव को परम सत्य से जोड़ते हैं तथा आत्मिक शान्ति प्रदान करते हैं।
१९. योगविदां नेता
शब्दार्थ :
योग को जानने वालों के नेता।
योग को जानने वालों के नेता।
भगवान सभी सिद्ध योगियों के गुरु और मार्गदर्शक हैं। वे ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ध्यानयोग के परम उपदेशक हैं।
२०. प्रधानपुरुषेश्वरः
शब्दार्थ :
प्रकृति (प्रधान) और पुरुष—दोनों के स्वामी।
प्रकृति (प्रधान) और पुरुष—दोनों के स्वामी।
भगवान प्रकृति और समस्त जीवों के परम नियन्ता हैं। सम्पूर्ण सृष्टि उनकी शक्ति से संचालित होती है और वे ही उसके परम अधीश्वर हैं।

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